इब्ने ज़ियाद ने उमर बिन साद को हुक्म दिया था कि हुसैन की लाश को घोड़ों के टापों से रौंद डाले। अब येह तक़दीर भी हज़रत हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु के बदने मुबारक पर पूरी हुई। दस सवारों ने घोड़े दौड़ाकर आप रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के जिस्मे अतहर को रौंद डाला । आह ! येह वोह जिस्म मुबारक था जिस को पैग़म्बरे इलाही, आप की प्यारी बेटी फातिमतुज़्ज़हरा रजियल्लाहु तआला अन्हा और हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु उठाए फिरते । यही वोह जिस्म था, जिस को सरवरे काएनात सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की पुश्त मुबारक और कंधों पर सवारी का शर्फ नसीब हुआ । यही जिस्म ज़ख़्मों से चूर, खून में शराबोर, मैदाने करबला में घोड़ों की टापों से रौंदा जा रहा था।
इस जंग में हज़रत हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु के 72 और कूफ़ीयों के 88 आदमी मक़्तूल हूए । इस शकावत और क्सावत के मुज़ाहिरे के बाद कूफ़ीयों ने वहशत और बरबरियत का इस तरह मुज़ाहिरा किया कि परवगियाने अफाफ़ के खैमों में घुस कर लूट घसूट शुरू कर दी, ख़वातीन के सरो से चादरे उतार ली गई। गौर कीजिये कि उस बेकसी के आलम में उन नबीज़ादीयों के कुलूब का क्या हाल होगा । येह सब कुछ उन्हों ने कमाले सब्रो तशुक्र से बरदाश्त किया ।
शुहदाए करबला के सर नेज़ों पर :-
सिलसिलए हर्ब व ज़र्ब और जिदाल व किताल के बा’द उमर बिन सा’द ने अपनी फौज को आराम करने का हुक्म दिया। क्यूंकि मुज़ाहिर शकावत से वोह थक चुके थे। दूसरे दिन मक़्तूले कूफ़ीयों की लाशें उमरो बिन सा’द ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाकर दफन कर दी मगर शोहदाअ की लाशें वैसे ही छोड़ दीं जिन्हें बा’द में करीबी आबादी के लोगों ने सुपुर्दे खाक किया। सह पहर को उमर बिन साद ने 72 शोहदाए अहले बैत के कटे हूए सर मुख्तलिफ क़बाइल के सरदारो को अला क़दरि मरातिब दो दो, चार चार और छे छे तकसीम किए जिन को उन्हों ने नेज़ों पर चढ़ा लिया और बड़े तज़क व एहतिशाम के साथ येह लश्कर फतह व ज़फ़र के शादियाने बजाता हूवा छेद हुए सरों को आगे आगे लिये हूए रवाना हुवा। उन सरों के हलके में अहले बैत की ख़वातीन थी जिन्हें उंटो पर सवार किया गया था ।
12 मुहर्रम को येह काफिला कूफा पहुंचा। कूफा के लोग इस जुलूस को देखने के लिये सड़कों, छतों और गलीयों पर जमा’ हो गए और शोहदा के सरों को नेज़ों पर देख कर इस तरह रोना पीटना शुरू कर दिया। येह वोह लोग थे जिन्हों ने खुतूत भेज कर ख़ुदा का वास्ते दे कर अपनी इताअत का यकीन दिला कर सय्यिदिना हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु को बुलाया और जब आप पहोंच गए तो रुपये-पैसे के लालच में आकर हज़रत हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु की बैत से मुन्हरिफ हो गए और इब्ने ज़ियाद की फौज में शामिल हो गए और खानदाने नबुव्वत का खातमा कर दिया। येह वही बुज़दिल और बेवफा कूफ़ी थे जो ख़ूद चैनो इत्मिनान से अपने घरों में बैठे रहे और उन से सिर्फ 10 फरसख़ के फासले पर मैदाने करबला में चमने रिसालत अपने ही के फ़रज़दों के हाथों पामाल और तबाहो बरबाद हूआ ।
इब्ने ज़ियाद ने इज़हारे मसर्रत के तौर पर एक दरबार मुनाकिद किया । तमाम कैदी सामने खड़े कर दिये गए और सय्यिदिना हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु का सर एक तश्त में रख कर उस के सामने लाया गया। उस बदबख़्त ने दंदान मुबारक पर क़िमची मार मार कहना शुरू किया, क्या यही वोह मुंह है जिस से तुम ने ख़िलाफ़त का दावा किया था ? उस वक़्त हज़रत अनस से ज़ब्त न हो सका, खड़े हो कर फ़रमाया बे अदब गुस्ताख़ अपनी क़िमची को हटा मैंने ख़ूद नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम देखा है वोह इन्हें चूमते और प्यार करते थे ।
हज़रत ज़ैद बिन अरकम इन्हीं अल्फाज़ का इआदा किया और इब्ने ज़ियाद को इस हरकत से डांटा । इब्ने ज़ियाद येह अल्फाज़ और डांट सुनकर आग बगूला हो गया और यह कह कर उसी वक़्त हज़रत अनस और जैद इब्ने अरकम रजियल्लाहु तआला अन्हु को दरबार से निकलवा दिया कि “तुम्हारी सहाबियत और बुढ़ापे पर रहम करता हूं, वरना अभी मरवा डालता” । वोह केहते हुए बाहर चले गए “तू वोह लईन है कि जब तूने फ़रज़ंदे रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को शहीद करवा दिया तो हमारी हस्ती क्या है ?”
इस के बाद इब्ने ज़ियाद ने इस कामियाबी पर खड़े हो कर ख़ुदा का शुक्रिया अदा किया कि अल्लाह का एहसान है जिसने हमें फ़तह अता की और हमारे दुश्मनों को तंगी और मुसीबत में गिरफ्तार किया ।
हज़रत ज़ैनब ने फरमाया: “ख़ुदा का एहसान है जिसने हमें खानदाने नुबुव्वत में पैदा कर के शरफ व बुजुर्गी अता फरमाई ।” इब्ने ज़ियाद बोला कि “देख लो अपने भाई का अंजाम जिस ने इसे ख़ाक में मिला दिया । येह है इस की कुदरते जलीला”। इस के जवाब में हज़रत ज़ैनुल आबिदीन ने येह आयते करीमा तिलावत की फिर कहा की “वोह वक़्त दूर नहीं जब हमारा और तुम्हारा मुआमला अहकमुल हाकिमीन के सामने पेश होगा ।”
इब्ने ज़ियाद ने झल्लाकर पूछा “यह कौन है?” जब मालूम हुवा कि हज़रत हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु का फ़रज़ंद है तो फौरन हुक्म दे दिया कि इसे क़त्ल कर दिया जाए। फिर बोला मैंने तुम्हे हुक्म नही दिया था कि नस्ले हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु से कोई अवलादे ज़कूर बाकी न रखी जाए ।
इस हुक्म पर हज़रत ज़ैनब तड़प गई और फ़रमाया “बदबख़्त ! क्या नस्ले मुहम्मदी को दुनिया से नापैद करना चाहता है”। इस के बाद आसमान की तरफ हाथ उठाकर दुआ की कि “या इलाही !” तेरे रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का सब खानदान इन ज़ालिमों के हाथों बरबाद हो चुका है। तेरे रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नवासा इन्तिहाई मसाइब उठाकर शहीद हो गया और अब येह शकी तेरे रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नस्ल ही कतअ करने के दर पे है। फरियाद है अय बेकसों के वारिष ! फरियाद है अपनी बंदी की सुन और अपने रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नस्ल काइम रख !
इस दुआ में कुछ ऐसा दर्द था कि फौरन कुबूल हो गई और इब्ने ज़ियाद ने अपना हुक्म वापस ले लिया । तीसरे रोज़ इब्ने ज़ियाद ने शिम्र की निगरानी में एक दस्ता फौज के साथ हज़रत हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु के सर मुबारक और अहले बैत को यज़ीद के पास दिमश्क भेज दिया ।
जब अहले बैत की ख़वातीन यज़ीद के महल में पहुंचाई गईं तो खानदाने मुआविया की ख़वातीन ने उन्हें देखकर वे इख़्तियार रोना पीटना शुरू कर दिया । चन्द रोज़ के बाद यज़ीद ने अहले बैत को मदीना की तरफ रुखसत किया । मुहाफ़िज़ ने रास्ते में इस मुसीबत ज़दा काफिले से बहोत अच्छा बरताव किया जब मंज़िले मकसूद पर पहोंचे तो हज़रत ज़ैनब बिन्ते अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हा और हज़रत फातिमा बिन्ते हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हा ने अपनी चुड़ीयां और कंगन उसे भेजा और कहा येह तुम्हारी नेकी का बदला है हमारे पास इस के सिवा और कुछ नहीं कि तुम्हें दे ।
खूबसूरत वाक़िआ:-कर्बला की सच्ची दास्तान और इमाम हुसैन।
मुहाफ़िज़ ने ज़ेवर वापिस कर दिये और कहा “वल्लाह ! मेरा येह बरताब किसी दुन्यवी तमअ से नहीं था। मुझे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की पासदारी मकसूद थी।” येह मज़लूम काफिला जब मदीना में पहुंचा तो तमाम शहर पर अफ़सुर्दगी और मायूसी छा गई। बनी हाशिम के लोग ज़ारो कतार रोने लगे मगर बजुज़ सब्र व शुक्र के क्या चारा था । और सिवाए इन्ना लिल्लाहि व इन्ना अलैहि राजिऊन। कहने के और क्या हो सकता था ?
यज़ीद, इब्ने ज़ियाद, उमर बिन साद, शिम्र और दीगर ज़ालिमों ने ख़मियाज़ा इसी दुनिया में बहोत जल्द भुगता । यज़ीद ने दर्द कूलंज में तड़प तड़प कर 39 साल की उम्र में जान दी, उस ने अपने बेटे मुआविया को आख़री वक़्त में वसियत के लिये बुलाया मगर उस ने खलीफा बनने से साफ इन्कार कर दिया ।
मुख़्तार सफ़ी ने कुव्वत पकड़ कर अहले बैते रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कातिलों को चुन चुन कर कतल किया । उन ही में उमर बिन साद, शिम्र और दीगर हज़ारहा अश्क्यिा कत्ल हूए । आख़िर में इब्ने ज़ियाद का सर तश्त में रख कर उसी महल में मुख्तार सफ़ी के सामने पेश किया गया जिस में सय्यिदिना हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु का सर इब्ने ज़ियाद के सामने लाया गया था ।
मुख़्तार सकफी के बाद मुसअब बिन जुबैर ने रहे सहे ज़ालिमों को भी मौत के घाट उतार दिया ।
कत्ले हुसैन असल में मर्गे यज़ीद है
इस्लाम ज़िन्दा होता है हर करबला के बाद।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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