12/07/2026
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शादी की रस्में |Shaadi ki rasmen.

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Shaadi ki rasmen.
Shaadi ki rasmen.

निकाह की रस्में

निकाह में जो चीजें फ़र्ज़ हैं, वे सिर्फ दो हैं- कम से कम दो गवाहों की मौजूदगी और ईजाब व कबूल और निकाह का मस्नून तरीक़ा यह है कि आम मज्मे में निकाह किया जाए।

खुत्बा और छोहारे बाँटना सुन्नत है, फ़र्ज़ वाजिब नहीं। सुहागरात (जिस रात दुल्हा-दुल्हन की मुलाकात होती है) के दूसरे दिन दावते वलीमा करना भी सुन्नत है और उसका तरीक़ा यह है कि अपनी हैसियत के मुताबिक गरीब व अमीर को खाने की दावत दी जाए और खाना खिलाया जाए।

अपनी हैसियत से ज़्यादा या कर्ज़ लेकर दावते वलीमा करना फिजुलखर्ची और गुनाह है और सिर्फ अमीरों और मालदारों को दावत देना और ग़रीबों को छोड़ देना भी सुन्नत के ख़िलाफ़ है।

और उसके बारे में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः बदतरीन खाना वलीम का वह खाना है, जिसमें गरीबों को छोड़कर सिर्फ अमीरों की दावत हो।’
(मिश्कात शरीफ़)

शरीअत के ख़िलाफ रस्में

शादी में बहुत-से काम ऐसे होते हैं जो शरीअत के ख़िलाफ़ हैं और गुनाह हैं। लड़के के रिश्तेदार या खुद लड़के की फरमाइशें, जहेज़ मे कुछ चीज़ों का तै कर लेना, लड़की या लड़के वालों के यहां गाना बजाना, एक दूसरे पर रंग फेंकना, दुल्हन की रु-नुमाई में महरम और गैर-महरम से लापरवाही, लड़के वालों की तरफ से लड़की को मांझा बिठाने के लिए औरतों का जाना और लड़की को मांझा बिठाना, जिसको लग्न की रस्म कहते हैं, दूल्हा, बारातियों और दुल्हन और दूसरी औरतों का फोटो लेना, ये सब रस्में इस्लाम के खिलाफ और गुनाह हैं।

बारातियों के खाने और लड़की को जहेज़ देने में अपनी हैसियत से ज़्यादा ख़र्च करना फिजूलखर्ची है और फिजूलखर्ची बड़ा गुनाह है। बारात तो इस्लाम में कोई चीज़ है ही नहीं कि उसको किया जाए।

लड़की को जहेज़ में उतनी ही चीजें देनी चाहिए जो लड़की के रिश्तेदान की हैसियत हो। इस सिलसिले मे लड़के या उसके रिश्तेदारों की फरमाइश जुल्म और बड़ा गुनाह है। जहेज़ ख़ालिस लड़की की चीज़ और मिल्कियत है। लड़की के रिश्तेदारों को इख़्तियार है, जितना और जो चाहें दें, किसी को उस पर जरब व दबाव का इख़्तियार नहीं।

मुसलमान मर्द और औरत को इन गैर-ज़रूरी और शरीअत के ख़िलाफ़ कामों से पूरा परहेज़ करना ज़रूरी है। दुनिया में सिवाए नाम व नमूद के कुछ हासिल नहीं और आख़िर में जहन्नम की तरफ ले जाने की वजहें हैं। कोई समझदार और दीनदान मुसलमान इसके लिए हरगिज़ तैयार न होगा कि सिर्फ नाम व नमूद के लिए अपने आपको जहन्नम का कुंदा बनाये।

औरतों को ख़ास कर इससे बचना ज़रूरी है, इसलिए कि रस्मों की ईजाद करने वाली और उसकी पाबन्दी करने वाली और कराने वाली ज़्यादातर यही होती है। कुरआन पाक में हुक्म हैः

तर्जुमा :- ‘ऐ ईमान वालो ! तुम अपने को ओर अपने घर वालों को दोज़ख़ की आग से बचाओ, जिसका ईंधन आग ओर पत्थर हैं।’ (सूरः तहरीम, पारा 28)

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।

जज़ाकल्लाह खैर….

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