खानदान
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम के बेटे और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पड़पाते हैं। उनको यह शरफ़ हासिल है कि वह खुद नबी, उनके वालिद नबी, उनके दादा नबी और परदादा हज़रत इब्राहीम अबुल अंबिया (नबियों के बाप) हैं। कुरआन में इनका ज़िक्र छब्बीस बार आया है और इनको यह भी फ़खर हासिल है कि इनके नाम पर एक सूरः (सूरः यूसुफ़) कुरआन में मौजूद है जो सबक़ और नसीहत का बेनज़ीर जखीरा है, इसीलिए कुरआन मजीद में हज़रत यूसुफ़ के वाक़िए को ‘अहसनुल क़सस’ कहा गया है।
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का ख़्वाब और यूसुफ़ के भाई
शुरू जिंदगी ही से हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की दिमाग़ी और फ़ितरी इस्तेदाद दूसरे भाइयों के मुक़ाबले में बिल्कुल जुदा और नुमायां थी। साथ ही हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की पेशानी का चमकता हुआ नूरे नुबूवत पहचानते और अल्लाह की वही के ज़रिए इसकी इत्तिला पा चुके थे।
इन वजहों से वे अपनी तमाम औलाद में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से बेहद मुहब्बत रखते थे और यह मुहब्बत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों से बेहद शाक़ और नाक़ाबिले बरदाश्त थी और वे हर वक़्त इस फ़िक्र में लगे रहते थे कि या तो हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम के दिल से इस मुहब्बत को निकाल डालें और या फिर यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ही को अपने रास्ते से हटा दें, ताकि क़िस्सा पाक हो जाए।
इन भाइयों के हसद भरे ख्यालात को जबरदस्त ठेस उस वक़्त लगी, जब यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने एक ख़्वाब देखा कि ग्यारह सितारे और सूरज व चांद उनके सामने सज्दा कर रहे हैं। हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम ने यह ख़्वाब सुना तो सख्ती के साथ उनको मना कर दिया कि अपना यह ख़्वाव किसी के सामने न दोहराना, ऐसा न हो कि उनको सुनकर तेरे भाई बुरी तरह पेश आएं, क्योंकि शैतान इंसान के पीछे लगा है ।
और तेरा ख़्वाब अपनी ताबीर में बहुत साफ़ और वाजेह है, लेकिन हसद की भड़कती हुई आग ने एक दिन यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों को उनके ख़िलाफ़ साजिश करने पर मजबूर कर ही दिया- तर्जुमा- ‘उनमें से एक ने कहा, यूसुफ़ को क़त्ल न करो और उसको गुमनाम कुएं में डाल दो कि उठा ले जाए उसको कोई मुसाफ़िर, अगर तुमको करना ही है।’ (यूसुफ 12 : 3)
इस मशविरे के बाद सब जमा होकर हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहने लगे –
तर्जुमा- ‘(ऐ बाप!) क्या बात है कि तुझको यूसुफ़ के बारे में हम पर एतमाद नहीं है, हालाकि हम उसके खैरख़्वाह हैं।'(यूसुफ 12 : 12)
हज़रत याकूब समझ गए कि उनके दिलों में खोट है।
तर्जुमा-‘याकूब ने कहा, मुझे इससे रंज और दुख पहुंचता है कि तुम इसको (अपने साथ) ले जाओ और मुझे यह डर है कि उसको भेड़िया खा जाए और तुम ग़ाफ़िल रहो।(यूसुफ 12 : 13)
यूसुफ़ के भाई ने यह सुनकर एक जुबान होकर कहा- तर्जुमा- ‘अगर खा गया इसको भेड़िया, जबकि हम सब ताक़तवर हैं, तो बेशक इस शक्ल में तो हमने सब कुछ गंवा दिया।'(यूसुफ 12 : 14)
कनआन का कुंवां
ग़रज़ यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाई यूसुफ़ को सैर कराने के बहाने ले गए और मशविरे के मुताबिक़ उसको एक ऐसे कुएं में डाल दिया, जिसमें पानी न था और मुद्दत से सूखा पड़ा था और वापसी में उसकी कमीज़ को किसी जानवर के खून में तर करके रोते हुए हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम के पास आए और कहने लगे, ‘ऐ बाप! अगरचे हम अपनी सच्चाई का कितना ही यक़ीन दिलाएं, मगर तुमको हरगिज़ यक़ीन न आएगा कि हम दौड़ में एक दूसरे से आगे निकलने में लगे हुए थे कि अचानक यूसुफ़ को भेड़िया उठाकर ले गया।
हजरत याकूब अलैहिस्सलाम ने यूसुफ़ के लिबास को देखा तो खून से लथपथ था, मगर किसी एक जगह से भी फटा हुआ न था और न चाक दामां था, फौरन हक़ीक़त भांप गए मगर भडकने, तान व तश्निअ करने और नफ़रत व हक़ारत का तरीक़ा अपनाने के बजाए पैगम्बराना इल्म व फ़रासत के साथ यह बता दिया कि हक़ीक़त छिपाने की कोशिश के बावजूद तुम उसे छिपा न सके।
तर्जुमा (हज़रत याकूब ने कहा, यह हरगिज़ नहीं, बल्कि बना दी है तुम्हारे नसों ने तुम्हारे लिए एक बात, अब सब्र ही बेहतर है और जो बात तुम जाहिर करते हो, उस पर अल्लाह ही से मदद मांगता हूं।’ (सुरह यूसुफ 12 : 18)
यूसुफ़ और गुलामी
इधर ये बातें हो रही थीं, उधर हिजाजी इस्माईलियों का एक क़ाफ़िला शाम से मिस्र को जा रहा था। कुंवां देखकर उन्होंने पानी के लिए डोल डाला। यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को देखकर जोश से शोर मचाया- तर्जुमा- ‘बशारत हो एक गुलाम हाथ आया।’ (यूसुफ़ 12-19)
ग़रज़ इस तरह हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को इस्माईली ताजिरों के क़ाफ़िले ने अपना गुलाम बना लिया और तिजारत के माल के साथ उनको भी मिस्र ले गए और बाज़ार में रिवाज के मुताबिक़ बेचने के लिए पेश कर दिया। उस वक़्त शाही खानदान का एक रईस और मिस्री फ़ौजों का अफ़सर फ़ोतीफ़ार बाजार से गुजर रहा था। उसने उनको ख़रीद लिया और अपने घर लाकर बीवी से कहा- तर्जुमा- ‘(देखो) इसको इज़्ज़त से रखो, कुछ अजब नहीं कि यह हमको फ़ायदा बख़्शे या हम इसको अपना बेटा बना लें। (यूसुफ़ 12-21)
फ़ोतीफ़ार ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को औलाद की तरह इज़्ज़त व एहतराम से रखा और अपने तमाम मामले और दूसरी ज़िम्मेदारियां उनके सुपुर्द कर दीं। यह सब कुछ अल्लाह की मंशा के मुताबिक़ हो रहा था।
तर्जुमा – ‘और इसी तरह जगह दी हमने यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को उस मुल्क में और इस वास्ते कि उसको सिखाएं बातों का नतीजा और मतलब निकालना और अल्लाह ताक़तवर रहता है अपने काम में, लेकिन अक्सर आदमी ऐसे हैं जो नहीं जानते।’ (यूसुफ़ 12-21)
अज़ीज़े मिस्र की बीवी और यूसुफ़ अलैहिस्सलाम
कुएं में डाले जाने और गुलामी के बाद अब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की एक और आजमाइश शुरू हुई, वह यह कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की जवानी का आलम था। हुस्न और खूबसूरती का कोई ऐसा पहलू न था जो उनके अन्दर मौजूद न हो। अजीजे मिस्र की बीवी दिल पर क़ाबू न रख सकी और यूसुफ़ अलैहिस्सलाम पर परवानावार निसार होने लगी, मगर नुबूवत के लिए मुंतख़ब आदमी से भला यह कैसे मुम्किन था कि अज़ीज़ की बीवी के नापाक इरादों को पूरा करे।
ये भी पढ़ें:हज़रत लूत अलैहिस्सलाम का वाक़िआ | Hazrat loot alaihissalam Ka waqia.
कुरआन में पेश आने वाले वाक़िए का ज़िक्र इस तरह से है-
तर्जुमा- ‘और फुसलाया यूसुफ़ को उस औरत ने, जिसके घर में वह रहते थे, उसके नफ़्स के मामले में और दरवाज़े बन्द कर दिए और कहने लगी, आ मेरे पास आ।’ यूसुफ़ ने कहा, ‘खुदा की पनाह’। (यूसुफ़ 12 : 23)
बहरहाल हज़रत यूसुफ़ दरवाज़े की तरफ़ भागे तो अज़ीज़ की बीवी ने पीछा किया और दरवाज़ा किसी तरह खुल गया। सामने अज़ीज़े मिस्र और औरत का चचेरा भाई खड़े थे। अज़ीज़े मिस्र की बीवी बोली -तर्जुमा-‘कहने लगी उस शख़्स की सज़ा क्या है जो तेरे अहल के साथ बुराई का इरादा रखता हो, मगर यह कि क़ैद कर दिया जाए या दर्दनाक अज़ाब में मुब्तला किया जाए।
यूसुफ़ ने कहा, इसी ने मुझको मेरे नफ़्स के बारे में फुसलाया था और फ़ैसला किया औरत के ही घराने के एक आदमी ने कि अगर यूसुफ़ का पैरहन सामने से चाक है तो औरत सच्ची है और यूसुफ़ झूठा है और अगर पीछे से चाक है तो औरत झूठी है और यूसुफ़ सच्चा है। पस जब उसकी क़मीज़ को देखा गया तो पीछे से चाक था, कहा, बेशक ऐ औरत ! यह तेरे मक्र व फ़रेब से है। बेशक तुम्हारा मक्र बहुत बड़ा है। यूसुफ़ ! तू इस मामले से दरगुज़र कर और ऐ औरत ! तू अपने गुनाह की माफ़ी मांग, तू बेशक ख़ताकार है। (यूसूफ़ 12: 25-29)
अज़ीज़े मिस्र ने अगरचे फ़ज़ीहत और रुस्वाई से बचने के लिए इस मामले को यहीं पर ख़त्म कर दिया, मगर बात छिपी न रह सकी। कुरआन मजीद में आता है- तर्जुमा-‘और (जब इस मामले का चर्चा फैला) तो शहर की कुछ औरतें कहने लगीं, देखो अज़ीज़ की बीवी अपने गुलाम पर डोरे डालने लगी कि उसे रिझा ले, वह उसकी चाहत में दिल हार गई हमारे ख्याल में तो वह खुली बदचलनी में पड़ गई।
पस जब अज़ीज़ की बीवी ने इन औरतों के मक्र को सुना, तो उनको बुला भेजा और उनके लिए मस्नदें तैयार कीं और (दस्तूर के मुताबिक़) हर एक को एक-एक छुरी पेश कर दी, फिर यूसुफ़ से कहा, इन सबके सामने निकल आओ। जब यूसुफ़ को इन औरतों ने देखा तो उसकी बड़ाई की क़ायल हो गईं, उन्होंने अपने हाथ काट लिए और (बे-अख्तियार) पुकार उठी, यह तो इंसान नहीं, ज़रूर एक फ़रिश्ता है, बड़े रुत्बे वाला फ़रिश्ता । (अज़ीज़ की बीवीं) बोली: तुमने देखा, यह है वह आदमी जिसके बारे में तुमने मुझे ताने दिए। (यूसुफ़ 12 : 30 से 33 तक)
अज़ीज़ की बीवी ने यह भी कहा कि बेशक मैंने उसका दिल अनपे क़ाबू में लेना चाहा था, मगर वह बे-क़ाबू न हुआ, मगर मैं कहे देती हूं कि अगर इसने मेरा कहा न माना तो यह होकर रहेगा कि वह क़ैद किया जाए और बेइज़्ज़ती में पड़े।
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने जब यह सुना और फिर अज़ीज़े मिस्र की बीवी के अलावा और सब औरतों के चरित्र अपने बारे में देखे तो अल्लाह के हुज़ूर में हाथ फैलाकर दुआ की और कहने लगे-
तर्जुमा-‘यूसुफ़ ने कहा, ऐ मेरे पालनहार ! जिस बात की तरफ़ यह मुझको बुलाती है, मुझे उसके मुक़ाबले में कैदखाने में रहना ज़्यादा पसन्द है और अगर तूने उनके मकर को मुझसे न हटा दिया और मेरी मदद न की, तो मैं कहीं उनकी ओर झुक न जाऊं और नादानों में से हो जाऊं। पस उसके रब ने उसकी दुआ कुबूल की और उससे उनका मकर हटा दिया। बेशक वह सुनने वाला, जानने वाला है।’ (यूसुफ 12 : 33-34)
अब अज़ीज़े मिस्र ने यूसुफ की तमाम निशानियां देखने और समझने के बाद अपनी बीवी की फजीहत व रुसवाई होती देखकर यह तै कर ही लिया कि यूसुफ को एक मुद्दत के लिए कैदखाने में बन्द कर दिया जाए, ताकि यह मामला लोगों के दिलों से निकल जाए, ये चर्चे बन्द हो जाएं, इस तरह हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम को जेल जाना पड़ा।
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम जेल में
तौरात में है कि यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के इल्मी और अमली जौहर कैदखाने में भी न छिप सके और कैदखाने का दारोगा उनके हलक़ा-ए-इरादत में दाखिल हो गया और जेल का तमाम इन्तिज़ाम व इन्सिराम उनके सुपुर्द कर दिया और वह कैदखाने के बिल्कुल मुख़्तार हो गए।
कैदखाने में दावत व तब्लीग
एक अच्छा इत्तिफ़ाक़ देखिए कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के साथ दो नवजवान और कैदखाने में दाखिल हुए। उनमें से एक शाही साक़ी था और दूसरा था शाही बावर्चीख़ाने का दारोगा। एक दिन दोनों नवजवान हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उनमें से साक़ी ने कहा कि मैंने यह ख़्वाब देखा है कि मैं शराब बनाने के लिए अंगूर निचोड़ रहा हूं और दूसरे ने कहा, मैंने यह देखा है कि मेरे सर पर रोटियों का ख़्वान है और परिंदे उसे खा रहे हैं।
यह सुनकर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: बेशक अल्लाह तआला ने जो बातें मुझे तालीम फ़रमाई हैं, उनमें से एक इल्म यह भी अता फ़रमाया है। मैं इससे पहले कि तुम्हारा मुक़र्ररा खाना तुम तक पहुंचे, तुम्हारे ख़्वाबों की ताबीर बता दूंगा, मगर तुमसे एक बात कहता हूं, जरा इस पर भी ग़ौर करो और समझो-बूझो ।
तर्जुमा-‘ऐ मज्लिस के साथियो ! (तुमने इस पर भी ग़ौर किया कि) जुदा-जुदा माबूदों का होना बेहतर है या एक अल्लाह का जो अकेला और सब पर ग़ालिब है। तुम इसके सिवा जिन हस्तियों की बन्दगी करते हो, उनकी हक़ीक़त इससे ज़्यादा क्या है कि सिर्फ कुछ नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं। हुक़ूमत तो अल्लाह ही के लिए है। उसका फ़रमान यह है कि सिर्फ़ उसकी बन्दगी करो और किसी की न करो, यही सीधा दीन है, मगर अक्सर आदमी ऐसे हैं जो नहीं जानते ।’ (यूसुफ़ 12 : 39-40)
रुश्द व हिदायत के इस पैग़ाम के बाद हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम उनके ख़्वाबों की ताबीर की तरफ़ मुतवज्जह हुए और फ़रमाने लगे –
‘दोस्तो ! जिसने देखा है कि वह अंगूर निचोड़ रहा है, वह फिर आज़ाद होकर बादशाह के साथी की ख़िदमत अंजाम देगा और जिसने रोटियों वाला ख़्वाब देखा है, उसको सूली दी जाएगी और परिंदे उसके सर को नोच-नोच कर खाएंगे।’
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम जब ख़्वाब की ताबीर से फ़ारिग हो गए तो साक़ी से, यह समझकर कि वह नजात पा जाएगा, फ़रमाने लगे, ‘अपने बादशाह से मेरा ज़िक्र करना।’ साकी को जब रिहा किया गया तो उसको अपनी मश्शूलियतों में कुछ भी याद न रहा और कुछ साल तक और यूसुफ़ को जेल में रहना पड़ा।
फ़िरऔन का ख़्वाब
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम अभी जेल ही में थे कि वक़्त के फ़िरऔन ने एक ख़्वाब देखा कि सात मोटी गाएं हैं और सात दुबली गाएं, दुबली गाएं मोटी गायों को निगल गईं और सात सरसब्ज़ व शादाब बालियां हैं और सात सूखी बालियों ने हरी बालियों को खा लिया। बादशाह सुबह उठा और फ़ौरन दरबार के मुशीरों से अपना ख़्वाब कहा। दरबारी इस ख़्वाब को सुनकर तरद्दुद में पड़ गए।
इस बीच साक़ी को अपना ख़्वाब और हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की दी हुई ताबीर का वाक़िया याद आ गया। उसने बादशाह की ख़िदमत में अर्ज़ किया कि अगर कुछ मोहलत दीजिए तो मैं उसकी ताबीर ला सकता हूं। बादशाह की इजाजत से वह क़ैदखाना पहुंचा और हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को बादशाह का ख़्वाब सुनाया और कहा कि आप इसको हल कीजिए। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने उसी वक़्त ख़्वाब की ताबीर दी और सही तदबीर भी बतला दी जैसा कि कुरआन में ज़िक्र किया गया है-
तर्जुमा-‘कहा, तुम खेती करोगे सात बरस जम कर, सो जो काटो उसको छोड़ दो उसको बाली में, मगर थोड़ा-सा जो तुम खाओ, फिर आएंगे इसके बाद सात वर्ष सख़्ती के, खा जाएंगे जो रखा तुमने उसके वास्ते मगर थोड़ा तो रोक रखोगे बीज के वास्ते, फिर आएगा, एक वर्ष उसके पीछे उसमें वर्षा होगी लोगों पर और उसमें रस निचोड़ेंगे।’ (यूसुफ़ 12 : 47-49)
साक़ी ने यह सब मामला बादशाह के सामने जा सुनाया। बादशाह ने ख़्वाब की ताबीर का मामला देखकर कहा कि ऐसे आदमी को मेरे पास लाओ। जब बादशाह का दूत हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पास पहुंचा तो हजरत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने क़ैदखाने से बाहर आने से इंकार कर दिया और फ़रमाया कि इस तरह तो मैं जाने को तैयार नहीं हूं, तुम अपने आक़ा के पास जाओ और उससे कहो कि वह यह जांच करे कि इन औरतों का मामला क्या था, जिन्होंने हाथ काट लिए थे? पहले यह बात साफ़ हो जाए कि उन्होंने कैसी कुछ मक्कारियां की थीं और मेरा परवरदिगार तो उनकी मक्कारियों को खूब जानता है।
ग़रज़ बादशाह ने जब यह सुना तो उन औरतों को बुलवाया और उनसे कहा कि साफ़-साफ़ और सही-सही बताओ कि इस मामले की सही हक़ीक़त क्या है, जबकि तुमने यूसुफ़ पर डोरे डाले थे, ताकि तुम उसको अपनी तरफ़ मायल कर लो? वह एक जुबान होकर बोलीं- तर्जुमा-‘बोलीं : माशाअल्लाह ! हमने इसमें बुराई की कोई बात नहीं पाई ? (यूसुफ़ 12-51)
मज्मा में अज़ीज़ की बीवी भी थी और अब वह इश्क़ व मुहब्बत की भट्टी में ख़ाम न थी, कुन्दन थी और ज़िल्लत व रुस्वाई के डर से आगे निकल चुकी थी। उसने जब यह देखा कि यूसुफ़ की ख़्वाहिश है कि हक़ीक़ते हाल सामने आ जाए तो बे-अख्तियार बोल उठी- तर्जुमा-‘जो हक़ीक़त थी, वह अब ज़ाहिर हो गई, हां! वह मैं ही थी, जिसने यूसुफ़ पर डोरे डाले कि अपना दिल हार बैठे। बेशक वह (अपने बयान मे) बिल्कुल सच्चा है।’ (यूसुफ़ 12:51)
इस तरह अब वह वक़्त आ गया कि तोहमत लगाने वालों की जुबान से ही साफ़ हो जाए, चुनांचे वाज़ेह और ज़ाहिर हो गया यानी शाही दरबार में मुजिरमों ने जुर्म का एतराफ़ करके यह बता दिया कि यूसुफ़ का दामन हर किस्म की आलूदगियों से पाक है। फ़िरऔन पर जब हक़ीक़त वाजेह हो गई तो उसके दिल में हजरत यूसुफ़ की अज़्मत व जलालत का सिक्का बैठ गया, वह कहने लगा- तर्जुमा-‘उसको (जल्द) मेरे पास लाओ कि मैं उसको खास अपने कामों बिया के लिए मुक़र्रर करूं।’
(यूसुफ़ 12 – 53)
दरबार में तशरीफ़ लाए, तो फ़िरऔन ने कहा-फ़िरऔन के इस हुक्म की तामील में हज़रत यूसुफ़ बादशाह के तर्जुमा-‘बेशक आज के दिन तू हमारी निगाहों में बड़े इक़्तेदार वाला और अमानतदार है।’ (यूसुफ़ 12:54)
और उनसे मालूम किया कि मेरे ख्वाब में अकाल का जिक्र है, उसके बारे मुझको क्या-क्या उपाय करने चाहिए। हज़रत यूसुफ़ ने जवाब दिया- तर्जुमा-‘अपने राज्य के ख़ज़ानों पर आप मुझे मुख़्तार (अख्तियार वाला) कर दीजिए, मैं हिफ़ाज़त कर सकता हूं और मैं इस काम का जानने वाला हूं।’ (यूसुफ़ 12:55)
चुनांचे बादशाह ने ऐसा ही किया और हज़रत यूसुफ़ को अपने पूरे राज्य का मुकम्मल ज़िम्मेदार बना दिया और शाही ख़ज़ाने की कुंजियां उनके हवाले करके मुख्तारे आम कर दिया। इसीलिए अल्लाह तआला ने अज़ीज़ के कारोबार का मुख़्तार बनाकर यूसुफ़ के लिए यह फ़रमाया था कि हमने उसको ‘तम्कीन फ़िल अर्जि’ (ज़मीन का पूरा मालिक व मुख्तार) अता कर दी। सूरः यूसुफ़ में ‘तम्कीन फ़िल अर्जि’ की खुशखबरी दो बार सुनाई गई है।
ग़रज़ हज़रत यूसुफ़ ने मिस्र राज्य के मुख़्तारे कुल होने के बाद ख़्वाब से मुताल्लिक़ वे तमाम तदबीरें शुरू कर दीं जो चौदह साल के अन्दर फ़ायदेमंद हो सकें और पब्लिक अकाल के दिनों में भी भूख और परेशानहाली से बची रह सके।
अकाल और याकूब अलैहिस्सलाम का ख़ानदान
ग़रज़ जब अकाल का जमाना शुरू हुआ तो मिस्र और उसके आस-पास के इलाक़े में सख़्त अकाल पड़ा और कनआन में हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम ने साहबजादों से कहा कि मिस्र में अजीजे मिस्र ने एलान किया है कि उसके पास गल्ला हिफ़ाज़त से रखा हुआ है, तुम सब जाओ और ग़ल्ला ख़रीद कर लाओ। चुनांचे बाप के हुक्म के मुताबिक़ यह कनआनी क़ाफ़िला मिस्र के अजीज से ग़ल्ला लेने के लिए मिस्र रवाना हुआ- तर्जुमा-‘और यूसुफ़ के भाई (ग़ल्ला ख़रीदने मिस्र) आए। वे जब यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पास पहुंचे तो उसने फ़ौरन उनको पहचान लिया और वे यूसुफ़ को न पहचान सके।’
(यूसुफ़ 12:58)
तौरात का बयान है कि यूसुफ़ के भाइयों पर जासूसी का इलज़ाम लगाया गया और इस तरह उनको यूसुफ़ के सामने हाज़िर होकर आमने-सामने बात करने का मौक़ा मिला और उन्होंने अपने बाप (हज़रत याकूब), सगे भाई (बिनयमीन) और घर के हालात को खूब कुरेद-कुरेद कर पूछा और-
तर्जुमा- ‘और जब यूसुफ़ ने उनका सामान मुहैया कर दिया तो कहा, अब आना तो अपने सौतेले भाई बिन यमीन को भी साथ लाना। तुमने अच्छी तरह देख लिया है कि मैं तुम्हें (ग़ल्ला) पूरी तौल देता हूं और बाहर से आने वालों के लिए बेहतर मेहमान नवाज़ हूं, लेकिन अगर तुम उसे मेरे पास न लाए तो फिर याद रखो, न तुम्हारे लिए मेरे पास ख़रीद व फ़रोख़्त होगी, न तुम मेरे पास जगह पाओगे।’ (यूसुफ़ 12 – 59-60)
फिर यूसुफ़ के भाई जब हज़रत यूसुफ़ से रुख़्सत होने आए, तो उन्होंने अपने नौकरों को हुक्म दिया कि ख़ामोशी के साथ उनके कजावों में उनकी वह पूंजी भी रख दो जो उन्होंने गल्ले की क़ीमत के नाम से दी है, ताकि जब घर जाकर उसको देखें, तो अजब नहीं कि फिर दोबारा आएं।
जब यह क़ाफ़िला कनआन वापस पहुंचा तो उन्होंने अपने तमाम हालात अपने बाप याकूब को सुनाए और उनसे कहा कि मिस्र के वाली (ज़िम्मेदार मालिक) ने साफ़-साफ़ हमसे कह दिया है कि उस वक़्त तक यहां न आना और न ग़ल्ले की खरीद का ध्यान करना, जब तक कि अपने सौतेले भाई बिन यमीन को साथ न लाओ, इसलिए अब आपको चाहिए कि उनको हमारे साथ कर दें, हम उसके हर तरह के निगहबान और हिफ़ाज़त करने वाले हैं। इस मौके पर हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम ने कहा-
तर्जुमा-कहा, क्या मैं तुम पर (बिन यमीन) के बारे में ऐसा ही एतमाद करूं जैसा कि इससे पहले उसके भाई (यूसुफ़) के बारे में कर चुका हूं, सो अल्लाह ही बेहतरीन हिफ़ाज़त करने वाला है और वह ही सबसे बढ़कर रहम करने वाला है। (यूसुफ़ 12 : 64)
इस बात-चीत से फ़ारिग़ होने के बाद अब उन्होंने अपना सामान खोलना शुरू किया, तो देखा, उनकी पूंजी उन्हीं को वापस कर दी गई है। यह देखकर वे कहने लगे, ऐ बाप! इससे ज़्यादा और क्या हमको चाहिए? अब हमें इजाजत दें कि हम दोबारा उसके पास जाएं और घर वालों के लिए रसद लाएं और बिन यमीन को भी हमारे साथ भेज दे, हम उसकी पूरी हिफ़ाज़त करेंगे।
हजरत याकूब अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि मैं बिन यमीन को हरगिज़ तुम्हारे साथ नहीं भेजूंगा, जब तक तुम अल्लाह के नाम पर मुझसे अहद न करो। ग़रज्ज अहद व पैमान के बाद यूसुफ़ के भाइयों का क़ाफ़िला दोबारा मिस्र को रवाना हुआ और इस बार बिनयमीन भी साथ था। हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम ने उनको रुख़्सत करते वक़्त नसीहतें फ़रमाईं-
तर्जुमा-फिर जब ये मिस्र में उसी तरह दाखिल हुए जिस तरह उनके बाप ने उनको हुक्म दिया, तो यह (एहतियात) उनको अल्लाह की मशीयत के मुक़ाबले में कुछ काम न आई, मगर यह एक ख़्याल था याकूब के जी में जो उसने पूरा कर लिया और बेशक वह इल्म वाला था और हमने ही उसको यह इल्म सिखाया था, लेकिन अक्सर लोग नहीं समझते।’ (यूसुफ़ 12 : 68)
इस बीच यह सूरत पेश आई कि जब यूसुफ़ के भाई कनआन से रवाना हुए, तो रास्ते में बिनयमीन को तंग करना शुरू कर दिया। कभी उसको बाप की मुहब्बत का ताना देते और कभी इस बात पर हसद करते कि अज़ीज़े मिस्र ने ख़ास तौर पर उसको क्यों बुलाया है और जब ये लोग मंज़िले मक़्सूद पर पहुंचे तो –
तर्जुमा- ‘और जब ये सब यूसुफ़ के पास पहुंचे तो उसने अपने भाई (बिन यमीन) को अपने पास बिठा लिया और उससे (धीरे से) कहा, मैं तेरा भाई (यूसुफ़) हूं, पस जो बदसुलूकी ये तेरे साथ करते आए हैं, तू उस पर ग़मगीन न हो।'(यूसुफ़ 12 : 69)
कनआनी क़ाफ़िला कुछ दिनों के क़ियाम के बाद जब रुख़्सत होने लगा तो यूसुफ़ ने हुक्म दिया कि उनके ऊंटों को इस क़दर लाद दो, जितना ये ले जा सकें। हज़रत यूसुफ़ की यह ख़्वाहिश थी कि किसी तरह अपने प्यारे भाई बिनयमीन को अपने पास रोक लें, लेकिन मिस्र की हुकूमत के क़ानून के मुताबिक़ किसी गैर-मिस्री को बगैर किसी माकूल वजह के रोक लेना सख्त मना था और हज़रत यूसुफ़ उस वक़्त हक़ीक़त खोलना नहीं चाहते थे, इसलिए जब क़ाफ़िला रवाना होने लगा तो किसी को इत्तिला किए बगैर शाही पैमाने को बिन यमीन की खुरजी में रख दिया, (ताकि भाई के पास एक निशानी रहे।)
तर्जुमा- ‘उस (यूसुफ़ ने अपने भाई बिन यमीन) के कजावे में कटोरा रख दिया। (यूसुफ़ 12 : 70)
कनआन के इस क़ाफ़िले ने अभी थोड़ा ही फ़ासला तै किया होगा कि यूसुफ़ के कारिंदों ने शाही बरतनों की देख-भाल की, तो उसमें प्याला न मिला, समझे कि शाही महल में कन्आनियों के सिवा दूसरा कोई नहीं आया, इसलिए उन्होंने ही चोरी की है, फ़ौरन दौड़े और चिल्लाए।
तर्जुमा-‘फिर पुकारा पुकारने वाले ने, ऐ क़ाफ़िले वालो ! तुम तो अलबत्ता चोर हो। वे कहने लगे उनकी ओर मुंह करके तुम्हारी क्या चीज़ गुम हो गई? वे कारिन्दे बोले, हम नहीं पाते बादशाह (यूसुफ़) का पैमाना (कटोरा) और जो कोई उसको लाए उसको मिले एक ऊंट का बोझ (ग़ल्ला) और मैं हूं उसका ज़ामिन। वे बोले, ख़ुदा की क़सम ! तुमको मालूम है कि हम शरारत करने को नहीं आए मिस्र के मुल्क में और न हम कभी चोर थे। वे (कारिंदे) बोले, फिर क्या सज़ा है उसकी अगर तुम निकले झूठे। कहने लगे, उसकी सज़ा यह है कि जिनके सामानों में हाथ आए, वही उसके बदले में जाए। हम यही सज़ा देते हैं ज़ालिमों को।’ (यूसुफ़ 12 : 71-75)
इस मरहले के बाद यह मामला अज़ीज़े मिस्र के सामने पेश हुआ और उनकी तलाशी ली गई तो बिनयमीन के कजावे में वह प्याला मौजूद था।
तर्जुमा-‘फिर यूसुफ़ ने उनकी खुर्जियां देखनी शुरू कीं। आख़िर में वह बरतन निकाला अपने भाई की खुरजी से।’ (यूसुफ़ 12: 76)
इसके बाद अल्लाह तआला फ़रमाता है- तर्जुमा ‘यों ख़ुफ़िया तदबीर कर दी हमने यूसुफ़ के लिए। वह हरगिज़ न ले सकता था अपने भाई यमीन को उस बादशाह (मिस्र) के तरीक़े के मुताबिक़, मगर यह कि अल्लाह तआला ही चाहे।
(यूसुफ़ 12 : 76)
इस तरह बिन यमीन को मिस्र में रोक लिया गया और यूसुफ़ के भाइयों ने जब यह रंग देखा तो बाप का अहद व पैमान याद आ गया और खुशामद भर अज़ मारूज़ करके अज़ीज़े मिस्र को बिनयमीन की वापसी की तीब दिलाई। यह तरीका भी कामियाब न हो सका तो आपस में मशविरे से यह तै पाया कि वालिद बुजुर्गवार को सही सूरत बतला दी जाए और कहा कि वे इस वाक़िए की तस्दीक़ दूसरे क़ाफ़िले वालों से भी कर लें।
इस मशविरे के मताबिक़ यूसुफ़ के भाई कनआन वापस आए और हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम से बिना कुठ घटाए-बढ़ाए साराः वाकिया कह सुनाया। हज़रत याकूब यूसुफ़ के मामले में उनकी सदाक़त का तजरुबा कर चुके थे. इसलिए फ़रमाया ‘तुम्हारे जी ने एक बात बना ली है, वाकिया यों नहीं है-बिन यमीन और चोरी? यह नहीं हो सकता, खैर अब सब्र के सिवा कोई चारा नहीं, ऐसा सब्र कि बेहतर से बेहतर हो।
अल्लाह तआला के लिए नामुम्किन तो नहीं कि एक दिन इन गुम लोगों को फिर जमा कर दे और एक साथ इन दोनों को मुझसे मिला दे। वेशक वह दाना है और हिक्मत वाला है और उनकी ओर से रुख फेर लिया और फ़रमाने लगे- ‘आह! यूसुफ़ की जुदाई का ग़म !’
हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की आंखें ग़म की ज़्यादती की वजह से रोते-रोते सफ़ेद पड़ गई थीं और सीना ग़म की जलन से जल रहा था, मगर सब्र के साथ अल्लाह पर तकिया किए बैठे थे।
बेटे यह हाल देखकर कहने लगे- ‘खुदा की क़सम ! तुम हमेशा इसी तरह यूसुफ़ की याद में घुलते रहोगे या इसी ग़म में जान दे दोगे !’
हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने यह सुनकर फ़रमाया, ‘मैं कुछ तुम्हारा शिकवा तो नहीं करता और न तुमको सताता हूं-
तर्जुमा-‘बल्कि में तो अपनी हाजत और ग़म अल्लाह की बारगाह में अर्ज़ करता हूं। मैं अल्लाह की ओर से वह बात जानता हूं, जो तुम नहीं जानते ।’ (यूसुफ़ 12 : 86)
बहरहाल हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने अपने बेटों से फ़रमाया: देखो, एक बार फिर मिस्र जाओ और यूसुफ़ और उसके भाई की तलाश करो और अल्लाह की रहमत से नाउम्मीद और मायूस न हो, इसलिए कि अल्लाह की रहमत से ना उम्मीदी काफ़िरों का शेवा है।’
यूसुफ़ के भाइयों ने तीसरी बार फिर मिस्र का इरादा किया और शाही दरबार में पहुंच कर अपनी परेशानी बयान की और खुसूसी लुत्फ़ व करम की दरख्वास्त भी की। हज़रत यूसुफ़ ने परेशानी का हाल सुना तो दिल भर आया और आपसे ज़ब्त न हो सका कि खुद को छिपाएं और राज़ ज़ाहिर न होने दें।
आख़िर फ़रमाने लगे – तर्जुमा-‘क्यों जी, तुम जानते हो कि तुमने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ क्या मामला किया, जबकि तुम जिहालत में डूबे हुए थे?’ (यूसुफ 12 : 89)
भाइयों ने यह उम्मीद के ख़िलाफ़ सुनकर कहा-
तर्जुमा-‘क्या तू वाक़ई यूसुफ़ ही है?'(यूसुफ 12-87)
हजरत यूसुफ़ ने जवाब दिया-
तर्जुमा-‘हां, मैं यूसुफ़ हूं और यह (बिनयमीन) मेरा मांजाया भाई है।
अल्लाह ने हम पर एहसान किया और जो आदमी भी बुराइयों से बचे और (मुसीबतों में) साबित क़दम रहे, तो अल्लाह नेक लोगों का अज्र बर्बाद नहीं करता।’ (यूसुफ 12-90)
यूसुफ़ के भाई यह सुनकर कहने लगे –
तर्जुमा-‘खुदा की क़सम, इसमें शक नहीं कि अल्लाह तआला ने तुझको हम पर बरतरी व बुलन्दी बख़्शी और बेशक हम पूरी तरह कुसूरवार थे।’ (यूसुफ़ 12 : 91)
हज़रत यूसुफ़ ने अपने सौतले भाइयों की खस्ताहाली और पशेमानी को देखा तो पैग़म्बराना रहमत और अफ़्व व दरगुज़र के साथ फ़ौरन फ़रमाया –
तर्जुमा-आज के दिन मेरी ओर से तुम पर कोई फटकार नहीं। अल्लाह तुम्हारा कुसूर बख़्शे और वह तमाम रहम करने वालों से बढ़कर रहम करने वाला है।(यूसुफ़ 12-92)
हज़रत यूसुफ ने यह भी फ़रमाया-
तर्जुमा-‘अब तुम कनआन वापस जाओ और मेरा पैरहन लेते जाओ, यह वालिद की आंखों पर डाल देना, इन्शाअल्लाह यूसुफ़ की ख़ुश्बू उनकी आंखों को रोशन कर देगी और तमाम खानदान को मिस्र ले आओ।’ (यूसुफ 12-93)
इधर यूसुफ़ के भाइयों का क़ाफ़िला कनआन को यूसुफ़ का पैरहन लेकर चला, तो उधर हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम को वह्य इलाही ने यूसुफ़ की ख़ुश्बू से महका दिया। फ़रमाने लगे, ऐ याकूब के खानदान! अगर तुम यह न समझो कि बुढ़ापे में उसकी अक़्ल मारी गई है, तो मैं यक़ीन के साथ कहता हूं कि मुझको यूसुफ की महक आ रही है। वे सब कहने लगे, ‘खुदा की क़सम ! तुम तो अपने उसी पुराने ख़ब्त में पड़े हो, यानी इस क़दर मुद्दत गुज़र जाने के बाद भी, जबकि यूसुफ का नाम व निशान भी बाक़ी नहीं रहा, तुम्हें यूसुफ़ ही की रट लगी हुई है।
कनआन का क़ाफ़िला वापस पहुंचा, तो वही हुआ जिसकी ओर हज़रत यूसुफ़ ने इशारा किया था-
तर्जुमा-‘फिर जब बशारत देने वाला आ पहुंचा, तो उसने यूसुफ़ के पैरहन को याकूब अलैहिस्सलाम के चेहरे पर डाल दिया, पस उसकी आंखें रोशन हो गई। याक़ूब अलैहिस्सलाम ने कहा, क्या मैं तुमसे न कहता था कि मैं अल्लाह की ओर से वह बात जानता हूं, जो तुम नहीं जानते।'(यूसुफ़ 12 : 96)
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों के लिए यह वक़्त बहुत कठिन था, शर्म व नदामत में डूबे हुए, सर झुकाये हुए बोले, ऐ बाप! आप अल्लाह की जनाब में हमारे गुनाहों की मगफ़िरत के लिए दुआ फ़रमाइए, बेशक हम ख़ताकार और कुसूरवार हैं।
हज़रत याकूब ने फ़रमाया-
तर्जुमा- ‘बहुत जल्द मैं अपने रब से तुम्हारी मगफ़िरत की दुआ करूंगा, बेशक वह बड़ा बख़्शने वाला, रहम करने वाला है।’
(यूसुफ़ 12:98)
याकूब का ख़ानदान मिस्र में
ग़रज़ हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम अपने सब ख़ानदान को लेकर मिस्र रवाना हो गए। तौरात के मुताबिक़ मिस्र आने वाले सत्तर लोग थे। जब हजरत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को इत्तिला हुई कि उनके वालिद ख़ानदान समेत शहर के क़रीब पहुंच गए तो वह फ़ौरन इस्तिक़बाल के लिए बाहर निकले। हजरत याकूब अलैहिस्सलाम ने एक लम्बी मुद्दत के बाद बेटे को देखा तो सीने से चिमटा लिया।
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने वालिद से अर्ज़ किया कि अब आप इज़्ज़त व एहतराम और अम्न व हिफ़ाज़त के साथ शहर में तशरीफ़ ले चलें। हजरत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने वालिद माजिद और तमाम ख़ानदान को शाही सवारियों में बिठा कर शहर और शाही महल में उतारा। इसके बाद एक दरबार सजाया गया। हज़रत यूसुफ़ के वालिद को शाही तख़्त पर जगह दी गई। इसके बाद खुद हज़रत यूसुफ़ शाही तख़्त पर बैठे। उस वक़्त दरबारी ‘हुकूमत के दस्तूर के मुताबिक़’ तख़्त के सामने ताज़ीम के लिए सज्दे में गिर पड़े। (ताज़ीम का यह तरीक़ा शायद पिछले नबियों में जायज़ रहा हो।
नबी-ए-करीम ने इस क़िस्म की ताज़ीम को अपनी उम्मत के लिए हराम क़रार दिया है और उसको जाते इलाही ही के लिए मख़्सूस बनाया है यूसुफ़ के तमाम ख़ानदान वालों ने भी यही अमल किया। यह देखकर हजरत यूसुफ़ को अपने बचपन का ज़म’ना याद आ गया और अपने वालिद से कहने लगे-
तर्जुमा ‘और यूसुफ़ ने कहा, ऐ बाप! यह है ताबीर उस ख़्वाब की जो मुद्दत’ हुई, मैंने देखा था, मेरे परवरदिगार ने उसे सच्चा साबित कर दिया।’ (यूसुफ 12 : 100)
ऊपर के वाक़ियात के अच्छे खात्मे से मुतास्सिर होकर यूसुफ़ बे-अख़्तियार हो गए और अल्लाह की जनाब में इस तरह दुआ की-
तर्जुमा-ऐ परवदिगार ! तूने मुझे हुकूमत अता फ़रमाई और बातों का मतलब और नतीजा निकालना तालीम फ़रमाया। ऐ आसमान व ज़मीन के बनाने वाले ! तू ही मेरा कारसाज है, दुनिया में भी और आख़िरत में भी। तो यह भी कीजियो कि दुनिया से जाऊं तो तेरी फ़रमांबरदारी की हालत में जाऊं और उन लोगों में दाखिल हो जाऊं जो तेरे नेक बन्दे हैं। (यूसुफ़ 12 : 101)
तौरात के मुताबिक़ इस वाकिए के बाद हजरत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का तमाम खानदान मिस्र ही में आबाद हो गया।
वफ़ात
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपनी जिंदगी के लम्बे अर्से को मिस्र ही में गुजारा और जब उनकी उम्र 110 साल की हुई तो उनकी वफ़ात हो गई तो उनको हुनूत (मम्मी) करके ताबूत में महफूज़ रख दिया और उनकी वसीयत के मुताबिक़ जब मूसा के ज़माने में बनी-इसराईल मिस्र से निकले तो उस ताबूत को भी साथ लेते गए और अपने बाप-दादा की सरज़मीन ही में ले जाकर सुपुर्दे ख़ाक कर दिया। बताया गया है कि इनकी क़ब्र नाबलस वे 149/646 यह कनआन का इलाक़ा है जिस पर अब इसराईल का क़ब्ज़ा है।
हज़रत यूसुफ़ की. पूरी जिंदगी ऊपर लिखे अख़लाक़ी मसलों पर गवाह है और इस दुआ के लिए दावत दे रही है- ‘ऐ आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले ! तू ही दुनिया और आखिरत में मेरा मददगार है, तू मुझे अपनी इताअत पर मौत दीजियो और नेक लोगों के साथ शामिल कीजियो।
(यूसुफ़ 12/101)
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
