हज़रत अली कर्रमल्लाहु तआला वज्हहुल करीम की खिदमत तीन शख़्स आए, उन के पास 17 ऊंट थे, उन लोगों ने आप से अर्ज किया कि इन ऊंटों को आप हमारे दरमियान तक़्सीम कर दें।
हम में एक शख़्स आधे का हिस्सेदार है, दूसरा तिहाई का और तीसरा नवें हिस्से का। मगर शर्त यह है कि पूरे पूरे ऊंट हर शख़्स को मिलें, काट कर तक़्सीम न करें और न किसी से कुछ पैसा दिलाएं।
बड़े-बड़े दानिशवर जो आप के पास बैठे हुए थे उन्हों ने आपस में कहा यह कैसे हो सकता है कि पूरे-पूरे ऊंट हर शख़्स को मिलें और वह काटे न जाएं, न किसी से कुछ पैसे दिलाए जायें। इस लिये कि जो शख़्स आधे का हिस्सेदार है उसे 17 में से साढ़े आठ (8-1/2) मिलेगा और जो शख़्स तिहाई का हकदार है वह 5-2/3 ऊंट पाएगा।
17 में से पूरा 6 उसे भी नहीं मिलेगा और जिस का हिस्सा नवां है, 17 में से वह भी दो से कम ही पाएगा। तो एक दो नहीं बल्कि तीन ऊंटों को ज़िंव्ह किये बगैर 17 ऊंटों की तक़्सीम इन लोगों के दरमियान हरगिज़ नहीं हो सकती।
मगर कुर्बान जाइये हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की अक़्ल व दानाई और उन की कुव्वते फैसला पर कि आप ने बिला तअम्मुल फौरन उन के ऊंटों को एक लाइन में खड़ा करवा दिया और अपने खादिम से फ़रमाया कि हमारा एक ऊंट इसी लाइन के आखिर में लाकर खड़ा कर दो, जब आप के ऊंट को मिला करं कुल 18 ऊंट हो गए, तो जो शख़्स आधे का हिस्सेदार था आप ने उसे 18 में से 9 दिया और तिहाई हिस्से वाले को 18 में से 6, फिर नवें के हिस्सेदार को 18 में से दो दिया अपने ऊंट को फिर अपनी जगह पर भिजवा दिया।
इस तरह आप ने न तो कोई ऊंट काटा और न ही किसी को कुछ नकद पैसा दिलवाया और 17 ऊंटों को उन की शर्त के मुताबिक तकसीम फरमा दिया जिस पर किसी शख्स को कोई ऐतराज़ नहीं हुआ।
ये भी पढ़ें:अगर अली न होते तो उमर हलाक हो जाता|Agar Ali na hote to umar halaq ho jata.
आप के इस फैसले को देख कर सारे हाज़िरीन दंग हो गए और सब बयक ज़बान पुकार उठे बेशक आप का सीना फज़्ल व कमाल का खज़ीना, हिक्मतो-अदालत का सफीना और इल्मे नुबुव्वत का मदीना है।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
