नजर के रोज़े का बयान
मस्अला 1:- जब कोई नजर माने, तो उसका पूरा करना वाजिब है। अगर न रखेगी, तो गुनाहगार होगी।
मस्अला 2 :- नजर दो तरह की है। एक तो यह कि दिन-तारीख तै करके नजर मानी कि या अल्लाह ! अगर आज फ़्लां काम हो जाये, तो कल ही तेरा रोज़ा रखूंगी, या यों कहा कि अल्लाह ! अगर मेरी फ़्लानी मुराद पूरी हो जाये, तो परसों जुमा के दिन रोज़ा रखूंगी। ऐसी नजर में अगर रात से रोज़ा की नीयत करे, तो भी दुरूस्त है और अगर रात से नीयत न की, तो दोपहर से एक घंटा पहले नीयत करे, यह भी दुरुस्त है,नजर अदा हो जायेगी।
मस्अला 3:- जुमा के दिन रोज़ा रखने की नजर मानी और जब जुमा आया, तो बस इतनी नीयत कर ली कि आज मेरा रोज़ा है। यह तै नहीं किया कि नजर का है या नफ़्ल का, सिर्फ नफ़्ल की नीयत कर ली, तब भी नजर का रोज़ा अदा हो गया, हां अगर उस जुमा को कज़ा रोज़ा रख लिया और नजर का रोज़ा रखना याद न रहा, या याद तो था, मगर जान-बूझकर कज़ा का रोज़ा रखा, तो नजर का रोज़ा अदा न होगा, बल्कि कज़ा का रोज़ा हो जायेगा, नजर का रोज़ा फिर रखो।
मस्अला 4 :- और दूसरी नजर यह है कि दिन-तारीख तै करके नजर नहीं मानी, बस इतना ही कहा कि या अल्लाह ! अगर मेरा फ़्लां काम हो जाये, तो एक रोज़ा रखूंगी या किसी का नाम नहीं लिया, वैसे ही कह दिया कि पांच रोज़े रखूंगी, ऐसी नजर में रात से नीयत करना शर्त है, अगर सुबह हो जाने के बाद नीयत की तो नजर का रोज़ा नहीं हुआ, बल्कि वह रोज़ा नफ़्ल रोज़ा हो गया।
खूबसूरत बयान:कज़ा रोज़े का बयान | Kaza Roze ka Bayan.
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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