14/08/2026
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मेहर की 3 किस्में कौन-सी हैं? शादीशुदा मुसलमान ये ज़रूरी मसला ज़रूर जानें – मेहर न देने पर क्या होगा?Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain? Shaadi-Shuda Musalman Ye Zaroori Masla Zaroor Jaanein- Mehr Na Dene Par Kya Hoga?

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Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?
Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

निकाह के वक़्त मेहर तय करना हर मुसलमान के लिए एक अहम मसला है, लेकिन अफसोस की बात है कि आज बहुत से लोग शादी तो कर लेते हैं, मेहर भी तय कर देते हैं, मगर उन्हें ये मालूम नहीं होता कि मेहर कितनी किस्म का होता है, कब अदा करना चाहिए और मेहर अदा न करने की सूरत में क्या हुक्म है।

कुछ लोग मेहर को सिर्फ एक रस्म समझते हैं और कुछ ये सोचते हैं कि मेहर तो तलाक़ के वक़्त ही देना होता है, जबकि हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग है। मेहर औरत का शरीअत से साबित हक़ है, जिसे अदा करना शौहर की ज़िम्मेदारी है।

इसलिए हर शादीशुदा मर्द और औरत को मेहर से जुड़े इन ज़रूरी मसाइल का इल्म होना चाहिए। इस लेख में हम आसान भाषा में जानेंगे कि मेहर की 3 किस्में कौन-सी हैं, मेहर कब अदा करना चाहिए और मेहर न देने के बारे में शरीअत क्या कहती है।

आप का और हमारा येह मुशाहेदा है की मुसलमानों में आज बड़ी तदाद में ऐसे लोग है जो शादी तो कर लेते हैं महेर भी बाँधते है लेकिन उन्हें यह पता ही नहीं होता के महेर कितने किस्म का होता है और उनका निकाह किस किस्म के महेर पर तय हुआ था, लिहाज़ा मुसलमानों को येह सब जान लेना बहोत ज़रूरी है ।

महेर तीन किस्म का होता है ।

मुअज्जल :- महेरे मुअज्जल येह है की रूखसती से पहले महेर देना करार पाया हो । चाहे दिया कभी भी जाए।

मुवज्जल :- महेरे मुवज्जल यह है की महेर की रकम देने के लिए कोई वक़्त ( Period) मुकरर्र कर दिया जाए ।

मुतलक :- महेरे मुतलक येह है की जिस में कुछ तय न किया जाए इन तमाम महेर की किस्मों में महेर “मुअज्जल” रखना ज्यादा अफजल है । यानी रूखसती से पहले ही महेर अदा कर दिया जाए (कानूने शरीअत, जिल्द 2, सफा नं. 60)

मसअला :- महेरे मुअज्जल वसूल करने के लिए अगर औरत चाहे तो अपने शौहर को सोहबत करने से रोक सकती है और मर्द को हलाल (जाइज़) नहीं की औरत को मजबूर करे या उसके साथ किसी तरह की ज़बरदस्ती करे ।

येह हक औरत को सिर्फ उस वक्त तक हासिल है जब तक महेर वसूल न कर ले इस दरमियान अगर औरत अपनी मरज़ी से चाहे तो सोहबत कर सकती है इस दौरान भी मर्द अपनी बीवी का नान नफ्का खाना पीना, कपड़ा, खर्चा वगैरा ) बन्द नहीं कर सकता। जब मर्द औरत को उस का महेर दे दें तो औरत को अपने शौहर को सोहबत करने से रोकना जाइज़ नहीं  (ताना-ए-मुस्तफाविया, जिल्द 3 सफा 66, कानूने शरीअत, जिल्द 2 सफा 60)

मस्अला :- इसी तरह अगर महेरे मुवज्जल था (यानी महेर अदा करने के लिए एक ख़ास मुदत मुकरर्र थी और वोह मुद्दत ख़त्म हो गई तो औरत शौहर को सोहबत करने से रोक सकती है ।(कानूने शरीअत, जिल्द 2, सफा नं. 60)

मस्अला:-औरत को महेर मुआफ कर देने के लिए मजबूर करना जाईज़ नहीं । इस ज़माने में ज्यादा तर लोग यही समझते है कि महेर ना कोई जरूरी नहीं बल्कि यह सिर्फ एक रस्म है ।

और कुछ लोगों का मानना है की महेर तलाक के बाद ही दिया जाता है, कुछ लोग है कि महेर इस लिए रखते हैं कि औरत को महेर देने की ख़ौफ से तलाक नही दे सकेगा ।

यही वजह है हमारे हिन्दुस्तान में ज्यादा तर लोग महेर नहीं देते यहाँ तक कि इन्तिकाल के बाद औरत उनके जनाज़े पर आ कर महेर मुआफ़ करती है। वैसे औरत के महेर मुआफ कर देने से मुआफ तो हो जाता है लेकिन महेर दिये बगैर दुनिया से चले जाना ठीक नहीं,

अगर खुदा न खाँसता पहले औरत का इन्तेकाल हो गया तो कियामत में सख्त पकड़ और सख्त अजाब होगा,लिहाजा इस खतरे से बचने के लिए महेर अदा कर देना चाहिये इस में सवाब भी है और येह हमारे आका सल्लल्लाह तआला अलैहि व सल्लम की सुन्नत भी है । (आयत: हमारा रब जल्ला जलालहू हमें क्या हुक्म फरमाता है,और औरतों को उन के महेर खुशी से दो ।(तर्जमा :- कन्जुल ईमाम. पारा 4. सूरए निसा, रूकू 12. आयत 4)

जहालत :- अक्सर मुसलमान अपनी हैसियत से ज्यादा महेर रखते हैं और येह ख्याल करते हैं कि “ज्यादा महेर रख भी दिया तो क्या फर्क पड़ता है देना तो है ही नहीं” यह सख्त जहालत है और दीन से मजाक ऐसे लोगों के मुल्लिक “शहजादा-ए-आला हजरत हुज़ूर मुफ्ती-ए-आजमे हिन्द मुस्तफा खाँ रहमतुल्लाह तआला अलैह अपने एक फतवे में इरशाद फरमाते हैं-

” महेर नहीं देना है एैसा ख्याल कर लेना बहुत बुरा है जो ऐसी नियत रखता है, कि वोह दीन नहीं समझता, वोह इस से डरे कि हदीसे पाक में है उसका हल जिना करने वालों के साथ होगा ।(फतावा-ए-मुस्तफाविया जिल्द 3 फा नं. 70

लिहाजा महेर उतना हो रखे जितना देने की हैसियत हो और महेर जितनी जल्दी हो सके अदा कर दे यही अफज़ल तरीका है ।

ये भी पढ़ें: गुस्ल कब फ़र्ज़ होता है? | हैज़, निफ़ास, एहतिलाम और हमबिस्तरी के इस्लामी अहकाम

हुजूर-ए-अक्दस रसूले मकबूल सल्लल्लाहो तआला अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया- “औरतों में वाह बहुत बेहतर है जिस का हुस्न व जमाल (खूबसूरती ) ज्यादा हो और महेर कम हो” । (कीम्या-ए-सआदत, सफा 260)

इमाम गज़ाली रजि अल्लाह तआला अन्हु फरमाते हैं “बहुत ज्यादा महेर बाँधना मकरूह है, लेकिन हैसियत से कम भी न हो” ।(कीम्या-ए-सआदत, सफा नं. 260)Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

FAQ – मेहर से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल 1: मेहर क्या होता है?
जवाब: मेहर वह रकम या माल है जो निकाह के ज़रिए शौहर पर अपनी बीवी के लिए वाजिब होता है। यह बीवी का हक़ है और इसे अदा करना ज़रूरी है।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

सवाल 2: मेहर की कितनी किस्में होती हैं?
जवाब: आम तौर पर मेहर की तीन किस्में बताई जाती हैं: मेहरे मुअज्जल, मेहरे मुवज्जल और मेहरे मुतलक।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

सवाल 3: मेहरे मुअज्जल क्या होता है?
जवाब: वह मेहर जिसे जल्द या रुख़्सती से पहले अदा करना तय किया गया हो, उसे मेहरे मुअज्जल कहा जाता है।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

सवाल 4: मेहरे मुवज्जल क्या होता है?
जवाब: जिस मेहर को अदा करने के लिए कोई खास वक़्त या मुद्दत तय की गई हो, उसे मेहरे मुवज्जल कहा जाता है।

सवाल 5: क्या मेहर सिर्फ तलाक़ के बाद देना होता है?
जवाब: नहीं। मेहर सिर्फ तलाक़ के वक़्त देने की चीज़ नहीं है। जिस तरह निकाह में मेहर तय हुआ हो, उसी के मुताबिक उसे अदा करना चाहिए।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

सवाल 6: क्या बीवी अपना मेहर माफ़ कर सकती है?
जवाब: अगर बीवी अपनी खुशी और बिना किसी दबाव के मेहर माफ़ कर दे तो अलग मसला है, लेकिन उसे मेहर माफ़ करने के लिए मजबूर करना जायज़ नहीं।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

सवाल 7: क्या शौहर अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा मेहर रख सकता है?
जवाब: मेहर ऐसा रखना चाहिए जिसे शौहर वास्तव में अदा करने की हैसियत रखता हो। केवल दिखावे के लिए बहुत ज्यादा मेहर तय करना और फिर अदा करने का इरादा न रखना सही रवैया नहीं है।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

सवाल 8: मेहर किसका हक़ है?
जवाब: मेहर पूरी तरह बीवी का हक़ है। उसके मेहर पर किसी दूसरे का हक़ नहीं होता, जब तक वह अपनी खुशी से कुछ देना न चाहे।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

सवाल 9: क्या मेहर जल्दी अदा करना बेहतर है?
जवाब: अगर मेहर तुरंत अदा करना तय हुआ हो तो उसे जल्द अदा करना चाहिए। अपने ऊपर किसी का हक़ बाकी रखकर टालते रहना मुनासिब नहीं।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

सवाल 10: मेहर अदा किए बिना शौहर का इंतिक़ाल हो जाए तो क्या होगा?
जवाब: अगर मेहर बाकी था तो वह शौहर के ज़िम्मे एक कर्ज़ है और उसके तर्के से उसकी अदायगी की जाती है। इसलिए मेहर को मामूली रस्म समझकर टालना नहीं चाहिए।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Mehr Ki 3 Kismein Kaun-Si Hain?
खुदा हाफिज़…..

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