एक रोज़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से शैतान मिला, और कहने लगा कि ऐ मूसा ! अल्लाह तआला ने तुम्हें अपनी रिसालत के लिए चुना और कलीम बनाया है,
मैं भी अल्लाह की मख़्लूक में शामिल हूँ और मुझ से एक गुनाह सरज़द हो गया है, अब मैं तौबा करना चाहता हूँ आप खुदा से मेरी सिफारिश कीजीए ताकि वह मेरी तौबा कबूल करले और मुझे मुआफ करदे,
हजरत मूसा अलैहिस्सलाम ने खुदा से अर्ज़ की और सिफिारिश की कि शैतान अब मुआफी चाहता है, उसे मुआफी दे दी जाए खुदा तआला ने फ़रमाया, मूसा ! मेरी नाराज़गी उससे आदम की वजह है, उसने आदम को सज्दा न किया तो मैं उससे नाराज़ हो गया,
अब अगर वह मुआफी चाहता है तो आदम अलैहिस्सलाम की कब्र पर जाए और आदम की कब्र को सज्दा करे तो मैं राज़ी हो जाऊँगा हज़रत मुसा अलैहिस्सलाम शैतान से मिले और फरमाया कि खुदा तआला ने मुआफी के लिए यह फरमाया है कि तुम आदम अलैहिस्सलाम की कब्र पर जाओ, और उन की कब्र को सज्दा कर लो तो मैं राज़ी हो जाउँगा,
और तुम्हारी तौबा कबूल कर लूँगा, शैतान ने कहा रहने दीजीए जनाब मैंने जब आदम को उन की जिंदगी में सज्दा नही किया तो अब उन के मरने पर उन की कब्र पर जाऊँ और कब्र पर सज्दा करूँ? यह कभी न होगा, मैं मुआफी नहीं चाहता !(तलबीस इब्लीस सः38, रूहूल-बयान जिः1 72)
शैतान बड़ा मगरूर और मुतकब्बिर है कि अपने गुरूर व तकब्बुर की वजह से, हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को उन की जिंदगी में भी सज्दा न किया और उनके विसाल के बअद अब उन की कब्र पर जाना और उनकी क़ब्र को सज्दा करना उसे गवारा नहीं, मरदूद में इतनी अकड़ है कि सदहा लअनतों के तौक गले में पड़ चुके और पड़ रहे हैं।
लेकिन अब तक भी वह कब्र पर जाना अच्छा नहीं समझता और अब भी वह कब्र पर जाने का मुखालिफ है, अल्लामा सफौरी अलैहिर्रहमह ने हज़रत नसफी से एक रिवायत दर्ज की है कि क़ियामत के रोज़ शैतान को जहन्नम से निकाला जाएगा और जन्नत से हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को उसके सामने लाया जाएगा और खुदा फरमाएगा, ऐ इब्लीस!
देख इन को सज्दा न करने की वजह से तू जहन्नम में दाखिल हुआ अब भी अगर तू इन को सज्दा करले तो मैं तूझे जहन्नम से निकाल लूँगा, शैतान कहेगा, नहीं मुझे मंजूर नहीं, दुनिया में मैंने जब इन्हें सज्दा नही किया तो अब क्यूँ करूँ।
(नुज़्हतुल-मजालिस जि.1 स.121)
देखा आपने शैतान की अकड़ को कि जहन्नम में जलना मंजूर लेकिन खुदा के पैग़म्बर की तज़ीम मंजूर नहीं, मुसलमानों को शैतान के इस हाल से सबक हासिल करना चाहिए, और अल्लाह के मकबूले की तजीम करनी चाहिए, और उनके मुकाबलों में कभी अकड़ नहीं चाहिए, जैसा कि शैतान अकड़ना था, वरना जो हाल इमाम का वही उनका !
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे, हमे एक और नेक बनाए, सिरते मुस्तक़ीम पर चलाये, हम तमाम को नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और इताअत की तौफीक़ आता फरमाए, खात्मा हमारा ईमान पर हो। जब तक हमे ज़िन्दा रखे इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखे, आमीन ।
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क्या पता अल्लाह ताला को हमारी ये अदा पसंद आ जाए और जन्नत में जाने वालों में शुमार कर दे। अल्लाह तआला हमें इल्म सीखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की तौफीक अता फरमाए । आमीन ।
खुदा हाफिज…
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