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वफ़ाते रसूल ﷺ का वह दर्दनाक मंज़र: जब सहाबा सदमे में थे और अबूबक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه ने कुरआन की आयत पढ़कर सबको संभाल लिया| Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar: Jab Sahaba Sadme Mein The Aur Abu Bakr Siddiq رضي الله عنه Ne Quran Ki Aayat Padhkar Sabko Sambhal Liya

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Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar.
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वफ़ात-ए-रसूल ﷺ और ख़ातमे नुबूवत का पैग़ाम

नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की वफ़ात का वाक़िआ उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए सबसे ग़मगीन और दिल को झकझोर देने वाले वाक़िआत में से एक है। जिस नबी ﷺ की मुहब्बत में सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم अपनी जान तक क़ुर्बान करने के लिए तैयार रहते थे, उनके पर्दा फ़रमा जाने की ख़बर ने सहाबा के दिलों को ऐसा सदमा दिया कि कुछ देर के लिए उनकी समझ और होश तक जवाब दे गए।

लेकिन उस नाज़ुक घड़ी में हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه ने कुरआन की आयत तिलावत करके उम्मत को यह हक़ीक़त याद दिलाई कि रसूलुल्लाह ﷺ अल्लाह के भेजे हुए रसूल हैं और हर इंसान की तरह उनके लिए भी वफ़ात का फ़ैसला मुक़र्रर था, जबकि हमेशा की ज़िंदगी सिर्फ़ अल्लाह तआला के लिए है।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

यही वाक़िआ हमें यह भी समझाता है कि नबी ﷺ की वफ़ात के साथ दीन-ए-इस्लाम ख़त्म नहीं हुआ, बल्कि आपकी लाई हुई हिदायत, कुरआन और आपकी सुन्नत क़यामत तक इंसानियत के लिए राह-ए-नजात बनी रहेगी। और इसी सिलसिले में ख़ातमे नुबूवत की अज़ीम हक़ीक़त सामने आती है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ अल्लाह के आख़िरी नबी और आख़िरी रसूल हैं। आपके बाद न कोई नबी आएगा और न नुबूवत का सिलसिला जारी रहेगा।

आइए, वफ़ात-ए-रसूल ﷺ के इस दर्दनाक वाक़िए, हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه की अज़ीम सूझ-बूझ और ख़ातमे नुबूवत की हक़ीक़त को कुरआन और तालीमात-ए-रसूल ﷺ की रोशनी में समझते हैं।

वफ़ात या वस्ल बिर्रफ़ीक़िल आला

तर्जुमा-यानी ‘मौत’ इस हक़ीक़त का नाम है जो नबी मुर्सल बल्कि ख़ातमुल मुरसलीन को भी पेश आकर रहेगी और हक़ीक़ी बक़ा तो जाते अहदियत की ही बिला शिर्कते गैरे ख़ास शान के साथ हासिल है। (3: 144)

अल्लाह ! अल्लाह ! वह कैसा अजीब मंज़र था कि जब नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ‘अल्लाहुम-मर्र-फ़ीकुल आला’ फ़रमाते हुए इस दुनिया से रुख़्सत हो गए, तो तमाम सहाबा रंज, ग़म-सदमे में इतने डूब गए थे कि उनके होश व हवास तक बजा न थे। इसी हाल में हजरत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने ग़म के भारी बोझ से दबकर तलवार सौंत कर यह नारा लगाया कि जो कहेगा, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इंतिक़ाल हो गया, तो इसी तलवार से उसकी गरदन उड़ा दूंगा।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

ऐसी बेचैनी और परेशानी की हालत में ख़ुदा का एक बन्दा सिद्दीके अक्बर आता हुआ नजर आता है। सबसे पहले वह हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के हुजरे में पहुंचता और टूटे दिल और भीगी आंखों के साथ सरवरे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चमकते माथे को बोसा देता और रसूल के फ़िराक़ से सदमे और बेचैनी का इज़्हार करता है और इश्क़ के इस फ़र्ज से फ़ारिग होकर जब बाहर आता है तो सहाबा की इस हालत का जायजा लेकर कि जिसमें जाहिलियत और इस्लाम दोनों दौरों की बे-मिसाल शख़्सियत उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु भी शामिल हैं, तो आगे बढ़कर कहता है, ऐ ख़त्ताब के बेटे ! बैठ जा। हजरत उमर वहीं बैठ जाते हैं और बड़े दुख और ग़म के साथ हज़रत अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु का मुंह तकने लगते हैं।

सिद्दीक़े अक्बर रज़ियल्लाहु अन्हु अब नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मिंबर पर खड़े होकर हक़ की आवाज़ बुलन्द करते हुए सहाबा के मज्मे को यों खिताब करते हैं-
‘लोगो ! जो आदमी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की परस्तिश करता था, उसको मालूम होना चाहिए ‘इन-न मुहम्मदन क़द ‘मा त’ (बेशक मुहम्मद इंतिक़ाल फ़रमा गए) कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मौत का मजा चख लिया है और जो एक अल्लाह का परस्तार है, तो बेशक ‘इन्नल्ला-ह हय्युन ला यमूतु’ अल्लाह जिन्दा जावेद है और मौत से पाक और बरी, उसको मौत नहीं है।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की यह हक़ की सदा जब फ़िज़ा में गूंजी तो सबसे पहले हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके बाद तमाम सहाबा पर सुकून का इत्मीनान छा गया और वे समझ गए कि बेशक सरदारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपना फ़र्जे रिसालत पूरा करके ‘रफ़ीक़े आला’ से जा मिले और अब इस्लाम मुकम्मल हो चुका, इसलिए अब हमारा फ़र्ज़ है कि रसूले पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुबारक नमूने और जिंदा जावेद मोजजे कलामुल्लाह ‘कुरआन’ को पेशवा बनाकर इस्लाम की ख़िदमत का फ़र्ज़ अंजाम दें।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु की कैफ़ियत तो यह हुई कि फ़रमाने लगे, क़सम ख़ुदा की सिद्दीक़े अकबर ने हक़ की यह सदा बुलन्द करते हुए जब यह आयत तिलावत की – ‘व मा मुहम्मदुन इल्ला रसूल क़द ख़-लत मिन क़ब्लिहिरुसुल’ (मुहम्मद तो रसूल थे, इससे पहले भी रसूल हुए जो गुज़र गए) तो मुझे ऐसा मालूम हुआ गोया अभी यह आयत उतर रही है और रसूल की मुहब्बत ने रसूल की जुदाई से मबहूत (सन्न) कर दिया था।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

कुरआन और तालीमे रसूल की रोशनी में जो कुछ मोहतरम साथी ने कहा, वह यकायक सूरज की तरह मेरे सामने आ गया। हदीस और सीरत की तमाम रिवायतें मुत्तफ़िक़ हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफ़ात माह रबीउल-अव्वल दिन दो शंबा (Monday) को हुई, अलबत्ता किस तारीख को हुई? इस बारे में बहुत से क़ौल हैं। मशहूर व मारूफ़ क़ौल यही है कि 12 रबीउल-अव्वल को हुई।

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सबक़ और नसीहत

1. कुरआन की सूरह फ़ातिहा में है, ‘चला हमको राह सीधी, राह उन लोगों की जिन पर तूने फ़ज़्ल किया, और दूसरी जगह सूरह निसा में ‘तो ऐसे लोग भी इन हज़रात के साथ होंगे जिन पर अल्लाह ने इनाम फ़रमाया है यानी नबी, सिद्दीक़, शहीद और सालेह क़िस्म के लोग, ये लोग बड़े अच्छे साथी हैं, यही वे साथी हैं जिनके बारे में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ‘अल्लाहुम-म अर्रफ़ीकुलं आला’ कहकर आख़िरी वक़्त में इशारा फ़रमाया।

2. ‘मौत’ अल्लाह का वह अटल फ़ैसला है जिससे नबी व रसूल और ख़ातमुल अंबिया वरुसुल भी अलग नहीं है और हमेशा की ज़िंदगी सिर्फ़ जाते हक़ ही के लिए ख़ास है।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

3. सिद्दीक़े अक्बर की अज़्मत व जलालते मर्तबा के इस वाक़िए से भी खुला एलान हो जाता है कि नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफ़ात के क़रीबी वक़्त में हालात की नज़ाकत ने सहाबा रजि० की अक़्ल व ख़िरद पर जो असर डाला, अगर ख़ुदा न ख़्वास्ता वह देरपा हो जाता तो इस्लाम अपनी हक़ीक़त से ख़ाली होकर रह जाता। (अयाज़न बिल्लाह) मगर यह सआदत अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ही के हिस्से में थी कि मुसलमानों की उस डगमगाती कश्ती को कुरआन की रोशनी में पार लगा दिया और ‘इस्लाम’ को एक शानदार फ़ित्ने से बचा लिया।

तर्जुमा- ‘बड़ाई अल्लाह की है, देता है जिसको चाहे और अल्लाह का फ़ज़्ल बड़ा है।’ (62:4)

नुबूवत व रिसालत का ख़ात्मा

नुबूवत व रिसालत का यह सिलसिला जो हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से शुरू होकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम तक पहुंचा था, रुश्द व हिदायत के उस्लूब व नेहज के लिहाज़ से इस मानी में एक जैसा है कि इस तमाम सिलसिले में नुबूवत व रिसालत जुग्राफ़ियाई हुदूद में महदूद रही है, इसलिए अलग-अलग जुबानों में एक ही वक़्त में कई नबियों की बेसत रिसालत की ज़िम्मेदारियां अदा करती रही है-यहां तक कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के हक़ के पैग़ाम ने अगरचे कुछ फैलाव अख़्तियार किया और बनी इसराईल की रास्ते में गुम हुई भेड़ों के अलावा भी कुछ इंसानी हलक़े इस दावत के मुख़ातब बने, फिर भी उन्होंने आलमी दावत व पैग़ाम का दावा नहीं किया और इंजील गवाह है कि खुद जाते कुदसी ने खुलकर कह दिया कि उनकी बेसत के जो लोग मुखातब हैं, वे महदूद हैं।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

लेकिन यह सिलसिला आख़िर कब तक हदों के अन्दर महदूद रह सकता था। दावत व इरशाद तो धीरे-धीरे तरक़्क़ी कर रहा था और उसमें फैलाव आ रहा था, वह कुदरत के क़ानून के आम उसूल के ख़िलाफ़ किस तरह हमेशा के लिए रह सकता था।

अलबत्ता इन्तिज़ार था तो इसका कि वह वक़्त क़रीब आ जाए जबकि इस फैली और लम्बी-चौड़ी दुनिया में ऐसा तालमेल पैदा हो जाए कि न एक के फ़ायदे और नुक़सान दूसरे हिस्सों से ओझल हो सकें और न बेगाना व बेताल्लुक़ रह सकें, बल्कि ख़ुदा की यह फैली हुई कायनात माद्दी (भौतिक) असबाब (साधनों) के बहुत होने के बावजूद एक ‘कुंबा’ बन जाए और इंसानी दुनिया के तमाम देश एक दूसरे के साथ इस तरह जुड़ जाएं कि एक का नफ़ा व नुक़्सान दूसरे के नफ़ा व नुक़्सान पर असर अंदाज़ होने लगे,Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

बल्कि फ़ितरत का क़ानून अपना मुज़ाहरा करे और माद्दी दुनिया की हमागीर हम आहंगी के ज़ाहिर होने से पहले रूहानी पैग़ामे सआदत को आलमगीर वुसअत और हमागीर अज़्मत अता फ़रमाए। चुनांचे इस दुनिया में फ़ितरत के आम क़ानून की तरह रुश्द व हिदायत की जो शुरूआत पहले इंसान के जरिए हुई थी, उसका अंजाम उस मुक़द्दस हस्ती तक पहुंच कर कामिल व मुकम्मल हो गया जिसका नाम ‘मुहम्मद’ और ‘अहमद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) है।

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तर्जुमा – ‘आज के दिन तुम्हारे लिए तुम्हारे दीन को मैंने कामिल कर दिया और मैंने तुम पर अपना इनाम पूरा कर दिया और मैंने इस्लाम को तुम्हारा दीन बनने के लिए पसन्द कर लिया।’ (5:3)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

सवाल 1: रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात कब हुई थी?
जवाब: रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात सोमवार के दिन, रबीउल-अव्वल में हुई। तारीख़ के बारे में उलमा के बीच अलग-अलग अक़वाल मिलते हैं, जबकि 12 रबीउल-अव्वल सबसे मशहूर क़ौल है।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 2: रसूलुल्लाह ﷺ ने आख़िरी वक़्त में क्या फ़रमाया था?
जवाब: आख़िरी वक़्त में रसूलुल्लाह ﷺ ने “अल्लाहुम्मा फ़िर-रफ़ीक़ल-आ’ला” के अल्फ़ाज़ फ़रमाए, यानी “ऐ अल्लाह! मुझे सबसे आला रफ़ीक़ के साथ कर दे।”Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 3: रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात पर हज़रत उमर رضي الله عنه की क्या कैफ़ियत थी?
जवाब: रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात का सदमा हज़रत उमर رضي الله عنه पर बहुत गहरा था। उन्होंने शुरू में वफ़ात की बात मानने से इनकार किया। बाद में हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه ने कुरआन की आयत पढ़कर हक़ीक़त साफ़ कर दी।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 4: हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه ने कौन-सी आयत पढ़ी थी?
जवाब: उन्होंने सूरह आले-इमरान की आयत 3:144 तिलावत की:
“मुहम्मद तो एक रसूल ही हैं, उनसे पहले भी बहुत से रसूल गुज़र चुके हैं।”
इससे सहाबा رضي الله عنهم को रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात की हक़ीक़त समझ में आई।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 5: क्या नबी और रसूल भी वफ़ात पाते हैं?
जवाब: जी हाँ। नबी और रसूल भी इंसान हैं और अल्लाह तआला के हुक्म से उन्हें वफ़ात आती है। हमेशा बाक़ी रहने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह तआला की है।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 6: “रफ़ीक़-ए-आला” से क्या मुराद है?
जवाब: “रफ़ीक़-ए-आला” से मुराद अल्लाह तआला के मुक़र्रब और इनाम पाए हुए बंदों की आला जमाअत है। कुरआन में नबियों, सिद्दीक़ों, शहीदों और सालेह लोगों का ज़िक्र इनाम पाए हुए लोगों के तौर पर किया गया है।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 7: क्या रसूलुल्लाह ﷺ के बाद कोई नबी आएगा?
जवाब: नहीं। हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ख़ातमुन-नबिय्यीन हैं। आपके बाद नुबूवत का सिलसिला ख़त्म हो चुका है।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 8: इस्लाम के मुकम्मल होने का ज़िक्र कुरआन में कहाँ है?
जवाब: सूरह अल-माइदा की आयत 5:3 में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया और इस्लाम को तुम्हारे लिए दीन के तौर पर पसंद कर लिया।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 9: रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात से उम्मत को क्या सबक़ मिलता है?
जवाब: सबसे बड़ा सबक़ यह है कि इंसान को अल्लाह तआला की इबादत पर क़ायम रहना चाहिए, कुरआन और सुन्नत को मज़बूती से पकड़ना चाहिए और मुश्किल हालात में भी दीन की हक़ीक़त को नहीं भूलना चाहिए।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

सवाल 10: हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه के ख़ुत्बे से क्या सीख मिलती है?
जवाब: इससे यह सीख मिलती है कि बड़े से बड़ा सदमा हो, मोमिन को कुरआन और अल्लाह के हुक्म की तरफ़ लौटना चाहिए। हज़रत अबू बक्र رضي الله عنه ने उसी नाज़ुक वक़्त में सहाबा को हक़ीक़त याद दिलाकर उनके दिलों को संभाला।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Wafate Rasool ﷺ Ka Woh Dardnaak Manzar
खुदा हाफिज़ ….

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