Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo
आज के दौर में कोई भी ख़बर बहुत तेज़ी से फैल जाती है। किसी ने कुछ सुना, दूसरे को बताया और देखते ही देखते वही बात कई लोगों तक पहुँच जाती है। लेकिन क्या हर सुनी-सुनाई बात पर फ़ौरन यक़ीन कर लेना सही है? इस्लाम हमें इस मामले में बहुत अहम और खूबसूरत रहनुमाई देता है।
कुरआन-ए-करीम ने साफ़ तौर पर हुक्म दिया कि अगर कोई फ़ासिक़ शख़्स तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो उसकी तहक़ीक़ कर लिया करो, ताकि नादानी में किसी क़ौम या शख़्स को नुक़सान न पहुँचे और बाद में अपने किए पर पछताना न पड़े। यह सिर्फ़ एक ज़माने के लिए नहीं, बल्कि हर दौर के मुसलमान के लिए बेहद अहम उसूल है।
इस हुक्म के पीछे ग़ज़वा-ए-बनी मुस्तलिक़ से जुड़ा एक ऐसा वाक़िआ है, जिसमें एक ग़लतफ़हमी की वजह से बड़ा मामला पैदा होने वाला था। अगर अल्लाह तआला की तरफ़ से रहनुमाई न आती, तो हालात और भी संगीन हो सकते थे। आइए जानते हैं कि आखिर क्या हुआ था और इस वाक़िए से हमें ख़बर सुनने, उसकी तहक़ीक़ करने और उसे आगे बयान करने के बारे में क्या सबक मिलता है।
फ़ासिक़ की दी हुई ख़बर
5 हिजरी में पेश आने वाले ग़ज़वा बनी मुस्तलिक़ में जब मुसलमान जीत गए और सहाबा के मशविरे की बुनियाद पर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क़बीले के सरदार की बेटी हज़रत जुवैरिया से निकाह कर लिया तो नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ससुराली रिश्ते की वजह से तमाम सहाबा ने लड़ाई के कैदियों को रिहा कर दिया और मुसलमानों के इस अच्छे व्यवहार और ऊंचे अख़लाक़ और इस्लामी खूबियों की वजह से मुतास्सिर होकर तमाम क़बीला मुसलमान हो गया, तब नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वलीद बिन उनबा को इसलिए उनके पास भेजा कि वे क़बीले के दौलतमंदों से ‘जकात’ वसूल करके उन ही के मुहताजों और ग़रीबों में बांट दें।
क़बीले वालों को जब वलीद के इस आने का इल्म हुआ तो इज़्ज़तदार हस्ती के आने के इस्तिक़बाल की तरह साज़ व सामान के साथ मैदान में निकले जाहिलियत के ज़माने में इस क़बीले के और वलीद के दर्मियान पुरानी दुश्मनी चली आ रही थी, इसलिए इस्तिक़बाल के इस एहतिमाम को वलीद ने दूसरी नज़र से देखा और समझा और अपनी ग़लत राय पर जमे रहे कर क़बीले वालों से मामला किए बगैर ही मदीना वापस आ गए और दरबारे कुदसी में हाज़िर होकर अर्ज़ किया कि बनी मुस्तलिक़ तो फिर गए और उन्होंने जकात देने से भी इंकार कर दिया और वे तो सरकशी पर भी तैयार हैं।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम यह सुनकर बनी मुस्तलिक़ के तरीक़े पर बहुत दुखी हुए और मुसलमान तो बिगड़ गए और जिहाद की तैयारियां होने लगीं, ताकि मुर्तद लोगों का मुक़ाबला किया जाए, यहां तक कि वे इस्लाम पर वापस आ जाएं या अपने नतीजे को पहुंचें।
इधर जब बनी मुस्तलिक़ को मालूम हुआ कि वलीद ने किसी बेजा ज़रूरत के साथ उनके बारे में नबी के दरबार में ग़लत बयानी की है, तो वे बेहद परेशान हुए, क्योंकि उनके तो वह्म व ख़्याल में भी यह नहीं था कि इन जैसे पुख़्ताकार और साबितक़दम मुसलमानों पर इस क़िस्म की तोहमत भी लगाई जा सकती है। चुनांचे उन्होंने फ़ौरन ख़िदमते अक़्दस में इज़्ज़तदार वफ़्द भेजा, जिसने हाज़िर होकर कुल माजरा कह सुनाया।
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एक तरफ़ अपने आमिल (वलीद) का वह बयान और दूसरी तरफ़ ‘हदीसुल अहद’ मुस्लिम जमाअत का यह बयान। इसलिए नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ख़ामोशी अपनाई और अल्लाह की वही का इन्तिजार किया।
आख़िर अल्लाह की वही ने रहनुमाई की और न सिर्फ़ मामले की हक़ीक़त ही खोल दी, बल्कि इस सिलसिले में एक मुस्तक़िल क़ानून या ‘तहक़ीक़ का मेयार’ अता फ़रमा दिया।
तर्जुमा – ‘ऐ ईमान वालो ! अगर तुम्हारे पास कोई (ग़लतकार) ख़बर लेकर आए तो जांच कर लिया करो, ऐसा न हो कि नादानी की वजह से किसी क़ौम पर जिहाद के नाम से हमलावर हो जाओ और फिर कल को असल हाल मालूम होने के बाद अपने किए पर पछताने लगो और जानो कि तुममें अल्लाह का रसूल मौजूद है।
अगर वह तुम्हारी बात अक्सर मामलों में मान लिया करे तो तुम अपने ग़लत रवैए की वजह से मुसीबत में पड़ जाओ, लेकिन अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल से तुम्हारे लिए ईमान को महबूब बना दिया है और तुम्हारे दिलों में उसको ज़ीनत बख़्शी है और तुम्हारे दिलों में कुफ़र और गुनाह और नाफ़रमानी के लिए नफ़रत पैदा कर दी है और हक़ीक़त में यही लोग हैं अल्लाह के फ़ज़्ल और एहसान की वजह से रास्ता पाने वाले और अल्लाह जानने वाला है, हिक्मतों वाला है।'(49 :6-8)
नतीजा
1. ख़बरों के बयान करने में आम तौर पर सजीदा और मुहज़्ज़ब जमाअत भी इसको ऐब नहीं समझती कि जो ख़बर भी उनके कानों तक पहुंचे, वे उसको बे-तकल्लुफ़ नक़ल करते रहें और हक़ीक़ते हाल की खोज की तक्लीफ क़तई तौर पर गवारा न करें, चाहे इस ख़बर से किसी न किये गए गुनाह पर झूठ गढ़ा जा रहा हो या किसी शख़्स या जमाअत को नुक्सान पहुंच रहा हो,Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
हालांकि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जोरदार लफ़्ज़ों में यह तंबीह फ़रमाई है-
‘हजरत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, इंसान के लिए यह गुनाह काफ़ी है कि हर सुनी बात को नक़ल करता रहे, यानी यह भी गुनाह की बात है कि सुनी-सुनाई बात का प्रोपगंडा. करे।’Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
2. जब कोई ऐसी ख़बर सुनी जाए जो फ़ायदे या नुक्सान के एतबार से ख़बर देने वाले पर या दूसरों पर असरंदाज़ होती हो, तो पहले उसकी जांच होनी चाहिए और जब पूरी तरह साबित हो जाए तब उससे मुताल्लिक़ नतीजों की तरफ़ तवज्जोह होनी चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. फ़ासिक़ की ख़बर के बारे में कुरआन में क्या हुक्म है?
कुरआन-ए-करीम में सूरह अल-हुजुरात की आयत 6 में हुक्म दिया गया है कि अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो उसकी तहक़ीक़ कर लिया करो, ताकि नादानी में किसी क़ौम को नुक़सान न पहुँच जाए।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
2. सूरह अल-हुजुरात 49:6 में क्या हिदायत दी गई है?
इस आयत में मुसलमानों को यह हिदायत दी गई है कि किसी भी अहम ख़बर पर फ़ौरन यक़ीन या कार्रवाई न करें, बल्कि पहले उसकी सच्चाई और हक़ीक़त की जांच करें।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
3. ग़ज़वा-ए-बनी मुस्तलिक़ में क्या वाक़िआ पेश आया था?
इस वाक़िए में वलीद बिन उक़बा रज़ियल्लाहु अन्हु से मंसूब एक ख़बर के बारे में ग़लतफ़हमी पैदा हुई। बाद में बनी मुस्तलिक़ के लोगों ने आकर अपनी तरफ़ की हक़ीक़त बयान की और इस मामले में अल्लाह तआला की तरफ़ से रहनुमाई नाज़िल हुई।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
4. क्या हर सुनी-सुनाई बात आगे बयान करना सही है?
नहीं। नबी-ए-करीम ﷺ ने सुनी-सुनाई हर बात को बयान करते रहने से सख़्त आगाह फ़रमाया है। मुसलमान को चाहिए कि किसी ख़बर को आगे पहुंचाने से पहले उसकी तस्दीक़ और तहक़ीक़ करे।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
5. सुनी-सुनाई बात फैलाने के बारे में हदीस क्या कहती है?
हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया कि इंसान के झूठा होने के लिए इतना ही काफ़ी है कि वह हर सुनी हुई बात बयान करता फिरे।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
6. किसी ख़बर की तहक़ीक़ करना क्यों ज़रूरी है?
क्योंकि एक ग़लत ख़बर से किसी बेगुनाह शख़्स की बदनामी, किसी जमाअत को नुक़सान और समाज में फ़साद पैदा हो सकता है। इसलिए इस्लाम जल्दबाज़ी के बजाय तहक़ीक़ और इंसाफ़ की तालीम देता है।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
7. सोशल मीडिया पर इस्लामी ख़बर शेयर करने से पहले क्या करना चाहिए?
ख़बर का भरोसेमंद स्रोत देखना चाहिए, उसकी सही तस्दीक़ करनी चाहिए और अगर बात साबित न हो तो उसे शेयर करने से बचना चाहिए। खासकर दीन के मामले में बिना जांच के कोई बात न फैलाएं।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
8. इस वाक़िए से हमें सबसे बड़ा सबक क्या मिलता है?
सबसे बड़ा सबक यह है कि हर ख़बर पर फ़ौरन यक़ीन नहीं करना चाहिए। पहले उसकी हक़ीक़त मालूम करनी चाहिए, फिर कोई राय बनानी या कार्रवाई करनी चाहिए।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
9. कुरआन में ख़बर की तहक़ीक़त का ज़िक्र किस सूरह में है?
ख़बर की तहक़ीक़त का यह अहम उसूल सूरह अल-हुजुरात, आयत नंबर 6 में बयान हुआ है।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
10. क्या झूठी या बिना तस्दीक़ ख़बर फैलाना गुनाह हो सकता है?
जी हाँ। अगर कोई शख़्स बिना तहक़ीक़ के ऐसी ख़बर फैलाता है जिससे किसी की इज़्ज़त, जान, माल या रिश्तों को नुक़सान पहुँचता है, तो यह बहुत गंभीर मामला हो सकता है। इसलिए मुसलमान को अपनी ज़बान और अपनी पोस्ट दोनों के बारे में सावधान रहना चाहिए।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Fasiq Ki Khabar Par Fauran Yaqeen Mat Karo!
खुदा हाफिज़ ….
