Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
आज हम एक ऐसे अहम मौज़ू पर बात करने वाले हैं, जिसको लेकर अक्सर लोगों के बीच सवाल और अलग-अलग राय सुनने को मिलती है — क्या इस्लाम में औरत के लिए चेहरे का पर्दा करना ज़रूरी है? क्या पर्दे के हुक्म में चेहरा भी शामिल है? और इस बारे में क़ुरआन और हदीस में क्या रहनुमाई मिलती है?
पर्दा इस्लाम में हया, पाकीज़गी और इज़्ज़त से जुड़ा हुआ एक अहम मौज़ू है। लेकिन चेहरे के पर्दे के बारे में मुख़्तलिफ़ फ़िक़्ही राय और तफ़्सील पाई जाती है। इसलिए इस मसले को सिर्फ़ अपनी राय से नहीं, बल्कि क़ुरआन, हदीस, सहाबा के अमल और उलमा की तफ़्सीर की रोशनी में समझना चाहिए।
इस लेख में हम चेहरे के पर्दे से जुड़े अहम दलाइल और उलमा की राय को आसान अल्फ़ाज़ में समझने की कोशिश करेंगे। साथ ही यह भी जानेंगे कि गैर-महरम के सामने चेहरे के पर्दे के बारे में फुक़हा ने क्या बयान किया है और किन हालात में अलग-अलग अहकाम हो सकते हैं।
हमारा मक़सद किसी पर अपनी राय थोपना नहीं, बल्कि दीन की बात को समझना और सही मालूमात हासिल करना है। इसलिए इस लेख को आखिर तक पढ़िए और अगर कोई फ़िक़्ही मसला आपके लिए व्यक्तिगत तौर पर लागू होता हो तो अपने भरोसेमंद आलिम से भी रहनुमाई हासिल करें।
तो चलिए बिस्मिल्लाह करते हैं और जानते हैं — चेहरे के पर्दे के बारे में इस्लाम क्या कहता है और क़ुरआन व हदीस की रोशनी में इस मसले की क्या तफ़्सील है। 🤲
चेहरे का पर्दा
आजकल कुछ नई सोच के दानिशवरों की तरफ़ से यह पोरपगंडा भी बड़े जोश व खरोश से किया जा रहा है कि इस्लाम में पर्दे का हुक्म तो है लेकिन इसमें चेहरे का पर्दा शामिल नहीं है हालाकि हुस्न और ज़ीनत का असल मर्कज़ तो इनसान का चेहरा है और आज के फ़ित्ना व फ़साद और ग़लबे हवस के ज़माने में इसका छिपाना ज़्यादा ज़रूरी है।
इलाज या अदालती गवाही और पहचान की शरई ज़रूरत के अलावा औरत के लिए चेहरे के खोलने की इजाज़त नहीं है। चंद दलाइल नीचे लिखे जाते है :
1. कुरआन मजीद ने فَاسْتَلُوهُنَّ مِنْ وَرَاءِ جَاب का हुक्म देकर बात खोल दी है कि चेहरा छिपाना भी ज़रूरी है। अगर चेहरा खोलना होता तो पर्दे के पीछे से बातचीत करने का हुक्म बेमानी था।
2. जब पर्दे की आयतें يُنْذِيْنَ عَلَيْهِنَّ مِنْ جَلًا يَهْدِينٌ नाज़िल हुई तो अज़वाजे मुतहात को तालीम दी गई कि सहाबा किराम रज़ि॰ से अपना चेहरा छिपाए। कौन कह सकता है कि वह ख़ुदा बचाए नंगे सर फिरती थीं और पर्दे की आयतों के ज़रिए उनको सर छिपाने का हुक्म हुआ।
हज़रत इब्ने अब्बास रज़िल्लाहु अन्हु इसकी तफ़्सीर फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ने मुसलमान औरतों को हुक्म दिया कि जब वह किसी ज़रूरत से निकलें तो सर के ऊपर अपनी चादरें लटकाकर अपने चेहरों को ढांप लें। (तफ़्सीर इब्ने जरीर)
इमाम मुहम्मद बिन सीरीन रहमतुल्लाह अलैह ने हज़रत उबैद बिन सुफ़ियान बिन हारिस रज़ियल्लाहु अन्हु से पूछा कि इस हुक्म पर अमल करने का तरीक़ा क्या है? उन्होंने चादर ओढ़कर तरीक़ा बताया और अपनी माथे और नाक और एक आँख को छिपाकर सिर्फ़ एक आँख खुली रखी। (तफ़्सीर इब्ने जरीर)
हदीस की किताबों अबूदाऊद तिर्मिज़ी, मौत्ता वगैरा में लिखा है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलहि वसल्लम ने औरतों को हालते एहराम में चेहरों पर नक़ाब डालने और दस्ताने पहनने से मना फ़रमा दिया था। इससे ज़ाहिर होता है कि उस दौर में चेहरों को छिपाने के लिए नक़ाब और हाथों को छिपाने के लिए दस्तानों के इस्तेमाल का रिवाज आम हो चुका था।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
हज़रत आएशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि जब मर्द हमारे क़रीब से गुज़रते और हम औरतें नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ हालते एहराम में होती थीं तो हम अपनी चादरें अपने सरों की तरफ़ से अपने चेहरों पर डाल लेती थीं और जब वे गुज़र जाते तो मुँह खोल लेती थीं। (अबूदाऊद)
ज़वाज़िर में इब्ने हिज्र मक्की रहमतुल्लाह अलैह ने इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाह अलैह का मज़हब नक़ल किया है कि अगरचे औरत का चेहरा और हथेलियाँ सतर औरत के फ़र्ज़ में दाखिल नहीं है, इनको खोलकर भी नमाज़ हो सकती है मगर गैर-महरम मर्दों को उनका देखना बिला शरई ज़रूरत के जाएज़ नहीं यानी औरत के लिए उनका दिखाना जाएज़ नहीं।
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इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह का मशहूर मज़हब भी यही है कि गैर महरम औरत के चेहरे और हथेलियों पर नज़र करना शरई उज्र के बगैर-जाएज़ नहीं।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
अल्लामा शामी रहमतुल्लाह अलैह अपने फ़तावा में लिखते हैं : औरत को चेहरा खोलने से रोका जाएगा ताकि मर्द देखने न पाएँ क्योंकि चेहरा खुलने की सूरत में शहवत भरी निगाह उन पर पड़ती है। (दुर्रे मुख्तार 24811)
अंग्रेज़ी का मकूला है : Face is index of mind.
चेहरा दिमाग का इंडेक्स होता है। लिहाज़ा किसी आदमी के चेहरे को देखकर उसकी पूरी शख्सियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। शर्म व हया, नेकी व बदी, ग़मी व ख़ुशी का अंदाज़ा चेहरे से ही हो जाता है। लिहाज़ा चेहरे का छिपाना ज़रूरी है।
जब किसी लड़की का रिश्ता पसन्द किया जाता है तो उसका चेहरा देखा जाता है। अगर किसी लड़की का चेहरा छिपा दें तो क्या जिस्म के बकिया हिस्सों को देखकर उसकी शख़्सियत का अंदाज़ा लगा सकते हैं। इससे मालूम हुआ कि चेहरे का पर्दा इंतिहाई ज़रूरी है।
अगर गैर-महरम मर्द व औरत एक-दूसरे का चेहरा देख लें तो बगैर बातचीत और गुफ़्तगू किए एक-दूसरे से मुहब्बत करने लग जाते हैं। बक़ौल शायर –
आँखों-आँखों में इशारे हो गए हम तुम्हारे तुम हमारे हो गए
क्योंकि चेहरे ही सबसे ज़्यादा फ़ित्ने की जगह हैं। लिहाज़ा चेहरे को पर्दे से अलग करना जिहालत और गुमराही की दलील है।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
चेहरे के पर्दे से जुड़े FAQ — सवाल और जवाब
सवाल 1: क्या इस्लाम में औरत के लिए चेहरे का पर्दा ज़रूरी है?
जवाब: इस मसले में उलमा के बीच फ़िक़्ही तफ़्सील और इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। कुछ उलमा गैर-महरम के सामने चेहरे को ढकना वाजिब मानते हैं, जबकि कुछ उलमा चेहरे और हथेलियों को असल पर्दे के फ़र्ज़ हिस्से में शामिल नहीं मानते। इसलिए इस मसले को क़ुरआन, हदीस और अपने मस्लक के भरोसेमंद आलिम की रहनुमाई में समझना चाहिए।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 2: क्या चेहरे का पर्दा और हिजाब एक ही चीज़ है?
जवाब: नहीं, दोनों में फर्क है। हिजाब में कपड़े, बदन की पोशाक और गैर-महरम से पर्दे के कई अहकाम शामिल होते हैं, जबकि चेहरे को ढकने को आम तौर पर नक़ाब कहा जाता है।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 3: क्या क़ुरआन में चेहरे के पर्दे का ज़िक्र मिलता है?
जवाब: क़ुरआन मजीद में पर्दे और पाकदामनी से जुड़े कई अहकाम आए हैं। चेहरे को ढकने के हुक्म के बारे में उलमा ने अलग-अलग आयतों की तफ़्सीर से इस्तिदलाल किया है, इसलिए इस विषय में तफ़्सीरी और फ़िक़्ही तफ़्सील मौजूद है।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 4: क्या हदीस में नक़ाब का ज़िक्र मिलता है?
जवाब: जी हाँ, अहादीस में नक़ाब का ज़िक्र मिलता है, खास तौर पर औरत के एहराम की हालत से संबंधित रिवायतों में। इन रिवायतों से उलमा ने चेहरे के पर्दे से जुड़े अलग-अलग अहकाम पर इस्तिदलाल किया है।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 5: गैर-महरम किसे कहते हैं?
जवाब: गैर-महरम वह शख़्स है जिससे निकाह शरई तौर पर मुमकिन हो सकता है। ऐसे मर्दों और औरतों के बीच पर्दे के अलग-अलग शरई अहकाम होते हैं।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 6: क्या सिर्फ़ चेहरा ढक लेना ही पर्दा है?
जवाब: नहीं। पर्दा सिर्फ़ चेहरे को ढकने का नाम नहीं है। इस्लामी पर्दे में लिबास की शरई शर्तें, बदन को ढकना, निगाहों की हिफ़ाज़त, हया और गैर-महरम के साथ मुआमलात के आदाब भी शामिल हैं।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 7: क्या औरत नमाज़ में चेहरा ढककर नमाज़ पढ़ सकती है?
जवाब: इस बारे में नमाज़ और गैर-महरम के सामने पर्दे के अहकाम अलग-अलग हो सकते हैं। आम हालात में नमाज़ के लिए चेहरे के पर्दे का हुक्म गैर-महरम के सामने पर्दे के हुक्म जैसा नहीं होता। व्यक्तिगत स्थिति के लिए आलिम से पूछना बेहतर है।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 8: क्या नक़ाब पहनना सिर्फ़ अरब देशों की रस्म है?
जवाब: नक़ाब को सिर्फ़ किसी एक मुल्क या क़ौम की रस्म कहना सही नहीं। मुस्लिम समाजों में अलग-अलग दौर और इलाक़ों में चेहरे को ढकने का अमल पाया गया है। इसके शरई हुक्म की चर्चा फ़िक़्ह की किताबों में भी मिलती है।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 9: क्या इलाज या पहचान की ज़रूरत में चेहरा खोल सकते हैं?
जवाब: वास्तविक ज़रूरत और शरई मजबूरी के मामलों में अलग अहकाम हो सकते हैं। जैसे इलाज या पहचान के लिए ज़रूरत हो तो स्थिति के मुताबिक़ रुख़्सत का मसला हो सकता है। ऐसे मामले में भरोसेमंद आलिम से सही रहनुमाई लेना बेहतर है।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 10: क्या चेहरे का पर्दा करने वाली औरत को दूसरों से बेहतर समझना चाहिए?
जवाब: किसी की नेकी का अंतिम फैसला अल्लाह तआला ही जानता है। पर्दे का एहतराम अपनी जगह है, लेकिन किसी दूसरे मुसलमान को सिर्फ़ इस मसले की वजह से कमतर समझना या उसकी तौहीन करना सही नहीं।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 11: क्या चेहरे के पर्दे के मसले में उलमा का इख़्तिलाफ़ है?
जवाब: जी हाँ, इस मसले में फ़िक़्ही तफ़्सील और राय का इख़्तिलाफ़ मिलता है। इसलिए सोशल मीडिया की छोटी-छोटी बातों के बजाय मुस्तनद क़ुरआनी तफ़्सीर, सही अहादीस और भरोसेमंद उलमा की रहनुमाई से मसले को समझना चाहिए।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
सवाल 12: चेहरे के पर्दे के बारे में सही मालूमात कहाँ से हासिल करें?
जवाब: क़ुरआन मजीद की मुस्तनद तफ़्सीर, सहीह अहादीस और फ़िक़्ह की भरोसेमंद किताबों से मालूमात हासिल करें। अगर मसला व्यक्तिगत तौर पर लागू होता हो तो अपने मस्लक के भरोसेमंद और आलिम-ए-दीन से सीधे सवाल करना सबसे बेहतर है।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।Chehre Ka Parda Kya Islam Mein Zaroori Hai?
खुदा हाफिज़…..
