Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
औलाद हर माँ-बाप की सबसे बड़ी नेमत और दिल का सुकून होती है। जब किसी माँ-बाप की औलाद इस दुनिया से चली जाती है, तो यह उनके लिए बहुत बड़ा सदमा और कठिन इम्तिहान होता है। ऐसे समय में इंसान का दिल टूट जाता है, लेकिन इस्लाम हमें सिखाता है कि हर हाल में अल्लाह तआला पर भरोसा रखें और सब्र से काम लें।
हदीस शरीफ़ में औलाद की मौत पर सब्र करने वाले माँ-बाप के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी दी गई है। अल्लाह तआला ऐसे सब्र करने वालों के लिए जन्नत, गुनाहों की मग़फिरत और बड़े अज्र का वादा फ़रमाते हैं।
इस आर्टिकल में हम हदीस की रौशनी में जानेंगे कि औलाद की मौत पर सब्र करने का क्या सवाब है, अल्लाह तआला ऐसे वालिदैन के लिए कौन-कौन से इनाम तैयार फ़रमाते हैं और मुश्किल वक़्त में एक मोमिन को कैसा रवैया अपनाना चाहिए।
औलाद की मौत पर सब्र करने का सवाब और आख़िरत का फायदा :
हदीसः हज़रत अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में एक सहाबी औरत रज़ियल्लाहु अन्हा हाज़िर हुए और अर्ज़ कियाः या रसूलल्लाह ! आपकी बातें मर्दों ने खूब हासिल कर लीं और हम मेहरूम रही जा रही हैं। लिहाज़ा अपनी तरफ से एक दिन हमारे लिए मुकर्रर फरमा दें, जिसमें हम आपकी ख़िदमत में हाज़िर हों और आप उन मालूमात में से जो अल्लाह तआला ने आपको अता फरमायी हैं, हमको बतायें।
यह सुनकर आप सल्ललाहु ताआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः अच्छा फलाँ फलाँ दिन तुम फलाँ जगह जमा हो जाना। चुनाँचे मुकर्ररा दिन और जगह पर सहाबी औरतें जमा हो गईं। उसके बाद नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ ले गये और उनको अल्लाह के दिये हुए उलूम में से बहुत कुछ बताया। फिर फरमाया कि तुममें से जो औरत अपनी ज़िन्दगी में तीन बच्चे पहले से आख़िरत में भेज देगी यानी तीन बच्चों की मौत पर सब्र कर लेगी तो यह बच्चों का पहले से चला जाना उस औरत के लिए दोज़ख से आड़ बन जायेगा।
उनमें से एक औरत ने सवाल कियाः या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! अगर दो ही बच्चों को आगे भेजा हो? यानी किसी औरत के दो ही बच्चे फौत हुए और उन्हीं पर सब्र करने का मौका मिला, तीसरे की मौत की नौबत ही न आयी, तो क्या दो बच्चों पर सब्र करने का भी यही दरजा है? नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अभी तक जवाब न देने पाए थे कि उसने फिर यही सवाल दोहरा दिया। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमायाः और दो बच्चे भेज देने का भी यही दरजा है। (मिश्कात शरीफ पेज 153)
तशरीहः इस हदीस से मालूम हुआ कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुबारक ज़माने में औरतों को दीनी मालूमात हासिल करने का बड़ा शौक था। और यह भी मालूम हुआ कि जब पहले औरतें जमा हो गईं तब उसके बाद हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ ले गये। औरतों की वअज़ (दीनी बयान) की मजलिस में जब कोई मर्द बयान करने जाये तो उसके लिए सुन्नत तरीका मालूम हो गया कि जब सब औरतें जमा हो जायें तब पहुँचे। इसमें पर्दे का ज़्यादा एहतिमाम है। क्योंकि वअज़ करने वाले की नज़र आने वालियों पर न पड़ेगी।
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इस हदीस में तीन बच्चों और दो बच्चों पर सब्र करने का मर्तबा दरजा और सवाब बताया है। दूसरी हदीसों से साबित है कि एक बच्चे पर सब्र करना भी दोज़ख़ से महफूज़ होने का ज़रिया है।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि जिसने ऐसे तीन बच्चे अपने आगे भेज दिये जो बालिग नहीं हुए थे तो ये बच्चे उसके लिए दोज़ख़ से हिफाज़त करने के लिए मज़बूत किला बन जायेंगे।
हज़रत अबूज़र सहाबी रज़ियल्लाहु अन्हु भी वहीं मौजूद थे, उन्होंने अर्ज़ किया मैंने तो दो ही बच्चे आगे भेजे, आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया दो बच्चे भेजने का भी यही दरजा है। हज़रत उब्बी बिन कअब रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि मैंने तो एक ही बच्चा आगे भेजा है, आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि एक बच्चा भेजने का भी यही दरजा है। (मिश्कात शरीफ)
आगे भेजने का मतलब यह है कि बच्चा माँ-बाप की ज़िन्दगी में उनसे पहले मर गया। और एक हदीस में है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः कसम उस ज़ात की जिसके कब्ज़े में मेरी जान है, बेशक गिरा हुआ हमल (गर्भ) भी नाफ़ के ज़रिये अपनी माँ को खींचकर जन्नत में पहुँचा देगा, बशर्तेकि उसकी माँ ने अल्लाह तआला से अज्र व सवाब की उम्मीद रखी हो। (मिश्कात शरीफ)
बच्चों की मुहब्बत एक फितरी चीज़ है। माँ-बाप को बच्चे से बहुत मुहब्बत होती है। ख़ासकर माँ की ममता तो मशहूर ही है। बच्चे की ज़रा-सी तकलीफ नहीं देख सकती। अगर बच्चा मर जाये तो माँ का बुरा हाल बन जाता है और उसके दिल को सख़्त सदमा होता है। उस वक़्त सारी खुशियाँ मिट्टी हो जाती हैं, इसी लिए माँ बाप के सब्र करने का बहुत बड़ा दरजा है।
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हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह फरमाते हैं कि जब मैं अपने बन्दे के प्यारे को उठा लूँ और वह सवाब का यकीन करे तो उसका बदला जन्नत के सिवा कुछ नहीं। (बुख़ारी शरीफ)
हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः जब बन्दे का कोई बच्चा फौत हो जाये यानी मर जाए तो अल्लाह तआला फरिश्तों से फरमाते हैं कि क्या तुमने मेरे बन्दे के बच्चे को कब्ज़ कर लिया है? वे अर्ज करते हैं हाँ! हमने ऐसा किया। फिर फरमाते हैंः क्या तुमने उसके दिल का फूल ले लिया? वे अर्ज़ करते हैं जी हाँ!
फिर अल्लाह तआला दरियाफ़्त फरमाते हैं हालाँकि उनको सब कुछ मालूम है कि मेरे बन्दे ने क्या कहा? वे अर्ज़ करते हैं अल्हम्दु लिल्लाह कहा, और इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन पढ़ा। अल्लाह तआला फरमाते हैंः मेरे बन्दे के लिए जन्नत में एक घर बना दो और उसका नाम “बैतुल-हम्द” यानी तारीफ का घर रख दो। (मिश्कात शरीफ)
हज़रत कुर्रह मुज़नी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि एक शख़्स हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में अपने बच्चे को लेकर आया करते थे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे पूछाः क्या तुम इस बच्चे से बहुत ज़्यादा मुहब्बत करते हो? उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! अल्लाह आप से भी ऐसी मुहब्बत करे जैसी मैं इससे मुहब्बत करता हूँ। यह उन्होंने अपनी समझ के मुताबिक कहा।
फिर आपने एक बार देखा कि उनका बच्चा साथ नहीं है। लोगों से पूछाः उनका बच्चा क्या हुआ? अर्ज़ किया वह मर गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे फरमायाः क्या तुम यह पसन्द करते हो कि तुम्हारा बच्चा तुमको जन्नत के हर दरवाज़े पर इन्तिज़ार करता हुआ मिले? मतलब यह है कि तुमने जो सब्र किया है उसका बदला इस तरह से मिलेगा कि जन्नत के जिस दरवाज़े से दाखिल होना चाहोगे बच्चे को स्वागत के लिए मौजूद पाओगे।
एक शख़्स ने सवाल कियाः या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! क्या यह बात उसी शख्स के लिए खास है या हम सबके लिए है? आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमायाः तुम सबके लिए है। (मिश्कात शरीफ)
FAQ (सवाल व जवाब)
1. औलाद की मौत पर सब्र करने का क्या सवाब है?
जवाब: हदीस शरीफ़ के मुताबिक, जो माँ-बाप अपनी औलाद की मौत पर सब्र करते हैं और अल्लाह से अज्र की उम्मीद रखते हैं, उनके लिए जन्नत और बहुत बड़ा सवाब है।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
2. क्या एक बच्चे की मौत पर भी इतना ही सवाब मिलता है?
जवाब: जी हाँ। हदीसों से साबित है कि एक बच्चे की मौत पर भी अगर माँ-बाप सब्र करें, तो अल्लाह तआला उन्हें बड़ा अज्र और जन्नत की खुशखबरी अता फ़रमाते हैं।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
3. अगर दो या तीन बच्चों की मौत हो जाए तो क्या फ़ज़ीलत है?
जवाब: हदीस में आया है कि दो या तीन बच्चों की मौत पर सब्र करने वाले वालिदैन के लिए वह बच्चे जहन्नम से बचाव का ज़रिया बनेंगे।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
4. बच्चे की मौत के बाद मुसलमान को क्या पढ़ना चाहिए?
जवाब: मुसलमान को “इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन” पढ़ना चाहिए, अल्लाह से सब्र की दुआ करनी चाहिए और उसके फैसले पर राज़ी रहना चाहिए।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
5. “बैतुल हम्द” क्या है?
जवाब: हदीस के मुताबिक, जब कोई माँ-बाप अपनी औलाद की मौत पर सब्र करके अल्हम्दुलिल्लाह कहते हैं, तो अल्लाह तआला उनके लिए जन्नत में “बैतुल हम्द” (तारीफ़ का घर) बनवाने का हुक्म फ़रमाते हैं।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
6. क्या गर्भ में बच्चे की मौत होने पर भी सवाब मिलता है?
जवाब: जी हाँ। हदीस में आया है कि अगर माँ सब्र करे और अल्लाह से अज्र की उम्मीद रखे, तो गर्भ में गिरा हुआ बच्चा भी अपनी माँ के लिए जन्नत का ज़रिया बन सकता है।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
7. औलाद की मौत पर रोना जायज़ है?
जवाब: दुख और आँसू आना इंसानी फ़ितरत है। लेकिन चीख़ना-चिल्लाना, अल्लाह के फैसले पर नाराज़गी जताना या सब्र छोड़ देना इस्लाम में पसंद नहीं किया गया।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
8. औलाद की मौत पर सब्र करने वाले माँ-बाप को आख़िरत में क्या मिलेगा?
जवाब: हदीस के मुताबिक, ऐसे वालिदैन के लिए जन्नत, गुनाहों की मग़फिरत, बड़े अज्र और बच्चों से दोबारा मुलाक़ात की खुशखबरी है।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
9. क्या बच्चे क़यामत के दिन अपने माँ-बाप की मदद करेंगे?
जवाब: जी हाँ। हदीसों में आता है कि नेक बच्चे अपने सब्र करने वाले माँ-बाप की शफ़ाअत करेंगे और उनके जन्नत में दाख़िले का ज़रिया बनेंगे।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
10. औलाद की मौत के बाद सबसे बेहतर अमल क्या है?
जवाब: सब्र करना, अल्लाह पर भरोसा रखना, दुआ करना, इस्तिग़फ़ार करना, सदक़ा करना और बच्चे के लिए रहमत की दुआ करते रहना सबसे बेहतर अमल है।Aulad Ki Maut Par Sabr Karne Ka Sawab
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह खैर….
