शहीदों के अलावा दूसरे लोग जो अल्लाह व रसूल से सच्ची मुहब्बत रखने वाले हैं, मरने के बाद वह भी ज़िंदा रहते हैं।
1933 ई० का वाकिआ है कि इराक पर हुक्मरानी के ज़माने में शाह फैसल अव्वल को हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम के जलीलुल कद्र सहाबी हज़रत हुज़ैफा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ख़्वाब में जियारत हुई, उसी हालत में शाह फैसल से फ़रमाया कि मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का सहाबी हुजैफा हूं, मुझे और हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह को अपनी अपनी कब्रों में बेइन्तिहा तक्लीफ पहुंच रही है, हम दोनों को मौजूदा कब्रों से निकाल कर दरियाए दजला के कुछ फासिले पर दफन किया जाए, मेरी कब्र में पानी आ रहा है और जाबिर की कब्र में बहुत ज़्यादा नमी आ गई है।
शाह फैसल बेदार हुआ तो हुकूमत के कामों में इस तरह मसरूफ हो गया कि वह रात के ख़्वाब की हिदायत बिल्कुल ही भूल गया। दूसरी रात में हज़रत हुजैफा ने फिर उसी तरह हिदायत फरमाई, मगर उस ज़माने में मुल्की और सियासी मामलात में इस कद्र पेचीदगी पैदा हो गई थी कि शाह फैसल जल्द मुकद्दस जिस्मों को नई कब्रों में मुन्तक्लि न कर सके, उस के बाद हज़रत हुजैफा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने ख़्वाब में इराक के मुफ्तिए आज़म को इस तरफ तवज्जोह दिलाई और बताया कि वह दो बार शाह फैसल को भी इस के लिये हिदायत कर चुके हैं मगर अभी तक इस पर अमल नहीं हुआ, इस लिये तुम शाह फैसल के पास जा कर कहो कि उन की राय से हमारे जिस्मों को मुनासिब मक़ाम पर मुन्तकिल किये जाने का इन्तेज़ाम करें।
दूसरे दिन सुबह बेदार होते ही मुफतिए आज़म नूरी अस्सईद पहले वज़ीरे आज़म इराक के पास पहुंचे और उन को अपने साथ लेकर शाह फैसल के सामने बयान किया, शाह फैसल ने उन की ताईद की और कहा कि बेशक मुसलसल दो रात मुझे इस की हिदायत की गई है मगर मैं अब तक कुछ तो सियासी उलझनों और कुछ मज़हबी पाबंदियों के सबब इस की तरफ तवज्जोह न कर सका, उस के बाद मुफ्तिए आज़म से कहा गया कि अगर आप इस के मुतअल्लिक फत्वा सादिर करें तों मैं फौरन इन हज़राते सहाबा के जिस्मों को मुनासिब मकाम पर दफन कराके मज़ार तामीर करने का मुकम्मल इन्तेज़ाम कर दूंगा।
मुफ्तिए आज़म ने अपनी आंखों से उन कब्रों को देखा, दर हकीकत कब्रों तक दरियाए दजला का पानी पहुंच चुका था और यह अंदेशा पैदा हो गया था कि अगर इन मुक्तद्र सहाबए किराम के जिस्मों को जल्द ही दूसरी जगह मुन्तकिल न किया गया तो मुम्किन है कुछ दिनों बाद दरियाए दजला का सैलाब इन को बहा ले जाए, इस अंदेशे के पेशे नज़र मुफतिए आज़म ने सहाबए किराम के जिस्मों को दूसरे मकाम पर दफन करने का फत्वा दे दिया और अख़्बारात के ज़रिये इस का ऐलान भी हो गया कि खास ईदुल अज़्हा के दिन बाद नमाज़े जुहर मजकूरा सहाबियों की कब्रें खोली जायेंगी और उनके बा बरकत जिस्मों को एक दूसरी जगह पर दफ़न कर दिया जाएगा।
अख़बारात में ऐलान छपते ही यह ख़बर पूरी दुनियाए अरब में फैल गई, हज का ज़माना था, दुनिया के चारों तरफ से तौहीद व रिसालत के परवाने फरीज़ए हज की अदाइगी और ज़ियारत रौज़ए अनवर की ग़रज़ से मक्का मुअज़्ज़मा और मदीना तैय्यिबा में हाज़िर थे लेकिन चूंकि खास ईदुल अज़्हा के दिन सहाबा के जिस्मों को मुन्तकिल किया जाने वाला था इस लिये जो लोग हज करने गए थे वह इस मौके पर शर्फ अंदोज़ नहीं हो सकते थे। तो शाहे इराक से दरख्वास्त की गई कि इन दोनों सहाबियों की कब्रों से उन के जिस्मों को उस वक़्त निकाला जाए जब हज का ज़माना गुज़र जाए ताकि तमाम मुल्कों के मुसलमान इस सआदत में हिस्सा ले सकें।
शाह ने तारीख की तब्दीली की मंजूरी कर ली और यह ऐलान कर दिया गया कि मुकद्दस जिस्मों को मुन्तकिल करने का काम 20 जिल्-हिज्जा को अंजाम दिया जाएग और साथ ही ऐसा इन्तिज़ाम कर दिया गया कि दरियाएं दजला का पानी उन कब्रों को कोई मज़ीद नुक्सान न पहुंचा सके। हस्बे ऐलान 20 जिल्-हिज्जा की सुबह ही लाखों मुसलमानों का अज़ीमुश्-शान इज्तिमाअ इस सहाबए किराम रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमु की कब्रों के गिर्द हो गया।
उन तमाम मुसलमानों की मौजूदगी में जब दोनों सहाबियों की कब्रें खोली गई तो वाकई हज़रत हुजैफा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की कब्र शरीफ में पानी आ रहा था और हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के मज़ारे मुबारक में भी गैर मामूली नमी देखी गई।
जब कब्रों से मुकद्दस जिस्म निकाले गए तो लोगों ने देखा कि तेरह सौ साल की लम्बी मुद्दत गुज़र जाने के बावजूद भी जिस्म बिल्कुल तरी ताज़ा हैं और अजीब व गरीब खुश्बू से महक रहे हैं। ऐसा मालूम होता था कि इन बुजुर्गों को विसाल फरमाए हुए शायद मुश्किल से चन्द घन्टे हुए होंगे। उनके चेहरों पर ऐसा नूर फैला हुआ था कि देखने से कल्बो नज़र को सुरूर हासिल होता था और उन पर नज़र नहीं ठहर सकती थी यहां तक कि कफन का कपड़ा भी बिल्कुल ताज़ा मालूम होता था और रीशे मुबारक (दाढ़ी) के बाल बिल्कुल सलामत थे।
और एक बात यह भी निहायत अजीब हुई कि हज़रत हुजैफा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के जिस्मे मुबारक को उठाने के लिये स्ट्रीचर का सामने लाया गया तो किसी को हाथ लगाने की ज़रूरत पेश नहीं आई बल्कि वह खुद बखुद स्ट्रीचर पर आ गया और हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का जिस्मे अक़्दस भी ऐसे ही आ गया, हाथ लगाने की ज़रूरत नहीं हुई। इन दोनों जिस्मों को उस के बाद दो शीशे ताबूतों में रख दिया गया और फिर बड़ी ऐहतियात के साथ नए मज़ारात में दफ़न कर दिया गया।
खूबसूरत वाक़िआ:- तहज्जुद के वक़्त फरिश्तों की तीन जमातें।
इस मौके पर शाह फैसल अव्वल, मुफ्तिए आज़म, वज़ीर आज़म और दूसरे मुल्कों के बड़े-बड़े उमरा व सुफरा भी मौजूद थे। जब यह वाकिआ अख़बारात के सफहात पर आया तो सारी दुनिया को यह हकीकत तस्लीम करनी पड़ी कि अल्लाह के महबूब बन्दे बादे विसाल भी जिंदा रहते हैं।
आसी शहीदे इश्क हूं मुर्दा न जानियो
मर कर मिली है जिंदगिए जाविदां मुझे
सल्लल्लाहु अलन्नबिय्यित् उम्मियी व आलिही सल्लल्लाह तआला अलेहि वसल्लम, सलातंव व सलामन् अलैक या रसूलल्लाह।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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