हदीस का तर्जुमा
हज़रत मालिक बिन हवीरस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु एक सहाबी हैं जो कबीला-ए-बनू लैस के एक फर्द थे, उनका कबीला मदीना मुनव्वरा से काफी दूर एक बस्ती में आबाद था, अल्लाह तबारक व तआला ने उनको ईमान की तौफीक अता फ़रमाई।
ये लोग मुसलमान होने के बाद अपने गांव से सफ़र करके मदीना मुनव्वरा में हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए, वह अपनी हाज़री का वाकिआ इस लम्बी हदीस में बयान फरमा रहे हैं कि हम हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में मदीना मुनव्वरा हाज़िर हुए और हम लोग सब नौजवान और हम उम्र थे।
और हमने हुज़ूर ए अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में बीस दिन कियाम किया, बीस दिन के बाद हुज़ूर ए अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ख़्याल हुआ कि शायद हमें अपने घर वालों के पास जाने की ख़्वाहिश पैदा हो रही है, चुनांचे आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हम से पूछा कि तुम अपने घर में किस किसको छोड़ कर आये हो?
यानी तुम्हारे घर में कौन कौन तुम्हारे रिश्तेदार हैं? हमने आपको बता दिया कि फलां फलां रिश्तेदार हैं। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हर इन्सान पर बड़े ही मेहरबान और बड़े ही नर्म आदत वाले थे। चुनांचे आपने हम से फ़रमाया कि अब तुम अपने घर वालों के पास जाओ, और जाकर उनको दीन सिखाओ और उनको हुक्म दो कि वे दीन पर अमल करें, और जिस तरह तुमने मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देखा है,
उसी तरह तुम भी नमाज़ पढ़ो और जब नमाज़ का वक़्त आ जाये तो तुम में से एक आदमी अज़ान दिया करे, और तुम में जो उम्र में बड़ा हो वह इमाम बने, ये हिदायतें देकर आपने हमें रुख़्सत फरमा दिया।
दीन सिखने का तरीका़ और सोहबत
यह एक लम्बी हदीस है, इसमें हमारे लिये हिदायत के अनेक सबक हैं, सब से पहली बात जो हज़रत मालिक बिन हवीरस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने बयान फरमाई वह यह थी कि हम नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में आये और हम नौजवान थे, और तकरीबन बीस दिन हुज़ूर ए अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में रहे।
हकीकत में दीन सीखने का यही तरीका था, उस ज़माने में न कोई बाकायदा मदरसा था और न कोई यूनिवर्सिटी थी, न कोई कॉलेज था और न किताबें थीं, बस दीन सीखने का यह तरीक़ा था कि जिसको दीन सीखना होता वह हुज़ूर ए अक़्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की सोहबत में आ जाता, और आकर आपको देखता कि आप किस तरह ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं?
सुबह से लेकर शाम तक आपके मामूलात क्या हैं? लोगों के साथ आपका रवैया कैसा है? आप घर में किस तरह रहते हैं? बाहर वालों के साथ किस तरह रहते हैं? ये सब चीजें अपनी आंखों से देख देख कर हुज़ूर ए अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सीरते तैयबा को मालूम करते और इसी से उनको दीन समझ में आता।
“सोहबत” का मतलब
अल्लाह तआला ने दीन सीखने का जो असल तरीक़ा मुकर्कर फरमाया है वह यही सोहबत है, इसलिये कि किताब और मदरसे से दीन सीखना तो उन लोगों के लिये है जो पढ़े लिखे हों, और फिर तन्हा किताब से पूरा दीन भी हासिल नहीं हो सकता, अल्लाह तआला ने इन्सान की ऐसी फितरत बनाई है कि सिर्फ़ किताब पढ़ लेने से उसको कोई इल्म व नहीं आता।
दुनिया का कोई इल्म सिर्फ़ किताब के ज़रिये हासिल नहीं हो सकता, बल्कि इल्म व हुनर के लिये सोहबत की ज़रूरत होती है। सोहबत का मतलब यह है कि किसी जानने वाले के पास कुछ दिन रहना और उसके तर्जे अमल का मुशाहदा करना, इसी का नाम सोहबत है, और यही सोहबत इन्सान को कोई इल्म व हुनर और कोई फन सिखाती है।
हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम का वाक़िआ
जैसे अगर किसी को डॉक्टर बनना है तो उसको किसी डॉक्टर की सोहबत में रहना होगा, अगर किसी को इन्जीनियर बनना है तो उसको किसी इन्जीनियर की सोहबत में रहना होगा। यहां तक कि अगर किसी को खाना पकाना सीखना है तो उसको भी कुछ वक़्त बावर्ची की सोहबत में गुज़ारना होगा और उस से सीखना पड़ेगा। इसी तरह अल्लाह तआला ने दीन का मामला रखा है कि यह दीन सोहबत के बगैर हासिल नहीं होता।
अल्लाह से एक दिली दुआ…
ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।
प्यारे भाइयों और बहनों :-
अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।
क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे।
इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें।
अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।
जज़ाकल्लाह ख़ैर….
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