18/07/2026
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बदनज़री का अंजाम और नज़र की हिफाज़त|Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat. Amazing story

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Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat
Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat

बदनज़री

इनसानी आँखें, जब बे-लगाम हो जाती हैं तो अक्सर बेहयाई की बुनियाद बन जाती है। इसी लिए मुहक़्क़िक़ीन के नज़दीक बदनज़री “उम्मुल खबाइस” यानी बुराईयों की जड़ की तरह है।

इन दो सुराखों से ही फ़ितने के चश्में उबलते हैं और माहौल व समाज में नंगेपन और बेहयाई के फैलने का सबब बनते हैं। इस्लाम ने इन दो सुराख़ों पर पहरा बिठा दिया। यह भी इस्लामी तालीमात का हुस्न जमाल है कि हर मोमिन को निगाहें नीचीं रखने का हुक्म दिया है न ही गैर-महरम पर नज़र पड़े और न ही शहवत की आग भड़के। न रहे बांस न बजे बांसुरी। उसूली बात है- बुराई की इब्तिदा को ही खत्म कर दो।

आमतौर पर देखा जाता है कि जिन लोगों की निगाहें बेक़ाबू होती हैं उनके अन्दर शहवत की आग भड़कती रहती है यहाँ तक कि उनसे बेहयाई का काम हो जाता है।

नज़र की हिफ़ाज़त के बारे में कुरआनी आयतें
इरशाद बारी तआला है :
तर्जुमा :- ईमान वालों से कह दीजिए कि अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें। इसमें उनके लिए पाकीज़गी है। बेशक अल्लाह तआला को खबर है, इसकी जो कुछ वे करते हैं।

कुरआन मजीद की यह आयत मोमिनों के लिए एक कामिल पैग़ाम है। मुफस्सिरीन ने लिखा है कि इस आयत में तादीब (अदब), तंबीह और तहदीद (डांट) का बयान है जिसकी तफ़्सील इस तरह है :

तादीब

आयत के इब्तिदाई हिस्से में तादीब है। मोमिनों को अदब सिखाया गया है कि जिन चीज़ों को देखना उनके लिए जाएज़ नहीं है उनसे अपनी निगाहें नीची रखें। बंदों को यही सजता है कि अपने आका की फ़रमांबरदारी करें। इससे यह भी मालूम हुआ निगाह नीची करना शुरूआत है और शर्मगाह की हिफ़ाज़त इन्तिहा है। गोया ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। बस जिसकी निगाह क़बू में नहीं उसकी शर्मगाह क़ाबू में नहीं।Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat.

तंबीह

जालिका अज़का लहुम में तंबीह है कि निगाह नीची करने का फ़ायदा यह है कि दिलों में पाकीज़गी आएगी। गुनाह का वसवसा ही पैदा नहीं होगा। इसमें उनका अपना फ़ायदा है। इबादत में यकसूई नसीब होगी, नफ़्सानी, शैतानी, शहवानी वसाविस से जान छूट जाएगी और अगर इस हिदायत पर अमल नहीं करेंगे तो बदनज़री की वजह से दिल के सुकून से महरुम हो जाएँगे। दिल में हसरतों की भरमार होगी। फ़ितने में पड़ने का क़वी अंदेशा होगा।Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat.

तहदीद (डांट)

इन्नल्ला-ह खबीरुम बिमा यसनऊन में डांट है। परवरदिगार आलम की तरफ़ से तंबीह है कि अगर बंदों ने इस हिदायत की परवाह न की तो याद रखें कि अल्लाह तआल ग़ाफ़िल नहीं। वह उनकी तमाम कारवाइयों से वाकिफ़ है। वह नाफ़रमानों से निपटना अच्छी तरह जानता है।Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat.

यह बात ज़हन में बिठा लें कि अगर इस्लाम ने मर्दों को खुले लफ़्ज़ों में अपनी निगाहें नीची रखने का हुक्म दिया है तो औरतों को भी नहीं छोड़ा। क्योंकि मर्द व औरत दोनों का खमीर एक ही है। लिहाजा औरत की फ़ितरत में भी शहवत रखी गई है।Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat.

उनके बारे में इरशादे बारी तआला है :
तर्जुमा:- ईमान वालियों से कह दीजिए कि अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें।

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इन दोनों आयतों का लब व लहजा इस हक़ीक़त को वाज़ेह कर रहा है कि आँखों की बेबाकी शहवत को भड़काती और शर्मगाह में उभार पैदा करती है। ऐसी हालत में इनसानी अक़्ल पर पर्दा पड़ जाता है। शहवत खुली आँखों के बावजूद इनसान को अंधा बना देती है।Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat.

इनसान गुनाह करके ज़िल्लत व रुस्वाई के गढ़े में जा गिरता है। शहवत के मामले में जो हाल मर्दों का है कम व बेश वही हाल औरतों का है। औरतें अमूमन जज़बाती होती हैं, जल्दी मुतास्सिर हो जाती हैं। उनकी निगाहें मैली हो जाएँ तो ज़्यादा फ़ितने जगाती हैं। लिहाज़ा उन्हें भी चाहिए कि अपनी निगाहें नीची रखें।

इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं :

तर्जुमा : फिर तू आँख की ज़रूर हिफ़ाज़त कर, अल्लाह तुझे और हमें तौफ़ीक़ अता फ़रमाए क्योंकि यह हर फ़ित्ने और आफ़त का सबब है।

इससे मालूम हुआ कि आँखों का फ़ित्ना बहुत हलाक करने वाला है और अक्सर फ़ित्नों और आफ़तों का बुनियादी सबब है।

नज़र की हिफ़ाज़त के बारे में हदीस मुबारक

नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशादे गरामी है : अपनी निगाहों को पस्त रखो और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करो।

हाफ़िज़ इब्ने कय्युम रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं :
“निगाह शहवत की क़ासिद और प्याम्बर होती है और निगाह की हिफ़ाज़त दरअसल शर्मगाह और शहवत की जगह की हिफ़ाज़त हैं जिसने नज़र को आज़ाद कर दिया उसने इसको हलाकत में डाल दिया। नज़र ही उन तमाम आफ़तों की बुनियाद है जिनमें इनसान मुब्तला होता है।” (अलजवाबुल काफ़ी -204)Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat.

नबी-ए-करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम का इरशाद गरामी है :
नज़र इब्लीस के तीरों में एक जहरआलूदा तीर है।

बाज़ बुजुर्गों का क़ौल है :
निगाह एक तीर है जो दिल में ज़हर डाल देता है। नबी-ए-करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम का इरशाद गरामी है :
आँखों का ज़िना देखना है।

इस हदीस पाक से मालूम हुआ कि जो आदमी किसी गैर-महरम के चेहरे पर शहवत भरी निगाह डालता है वह अपने दिल में उसके साथ ज़िना कर चुका होता है। बुजुर्गो ने निगाह को “बरीदुल इशक” यानी “इश्क़ का प्याम्बर” कहा है।Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat.

जुलेखा अगर हज़रत यूसुफ़ अलैहिससलाम के चेहरे पर नज़र न डालती तो जज़्बात के हाथों बेकाबू होकर गुनाह की दावत न देती। चंद लम्हों की बेताबी ने उसकी रुसवाई भरे बोल का तज़्किरा कुरआन मजीद में करवा दिया। बेहयाई वाले काम की निस्बत क़यामत तक उसकी तरफ़ रहेगी।

इबरत हासिल करनी चाहिए कि बदनज़री की रुसवाईयाँ कितनी बड़ी और कितनी बुरी है।Badnajri ka anjam aur najar ki hifajat.

अल्लाह से एक दिली दुआ…

ऐ अल्लाह! तू हमें सिर्फ सुनने और कहने वालों में से नहीं, अमल करने वालों में शामिल कर, हमें नेक बना, सिरातुल मुस्तक़ीम पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हम सबको हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और पूरी इताअत नसीब फरमा। हमारा खात्मा ईमान पर हो। जब तक हमें ज़िंदा रखें, इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखें, आमीन या रब्बल आलमीन।

प्यारे भाइयों और बहनों :-

अगर ये बयान आपके दिल को छू गए हों, तो इसे अपने दोस्तों और जानने वालों तक ज़रूर पहुंचाएं। शायद इसी वजह से किसी की ज़िन्दगी बदल जाए, और आपके लिए सदक़ा-ए-जारिया बन जाए।

क्या पता अल्लाह तआला को आपकी यही अदा पसंद आ जाए और वो हमें जन्नत में दाखिल कर दे। इल्म को सीखना और फैलाना, दोनों अल्लाह को बहुत पसंद हैं। चलो मिलकर इस नेक काम में हिस्सा लें। अल्लाह तआला हम सबको तौफीक़ दे – आमीन।

जज़ाकल्लाह खैर….

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